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नोटबंदी का असर ‘उमरा’ पर भी, मक्का नहीं जा पा रहे ज़ायरीन

नई दिल्ली। नोटबंदी के मद्देनजर धार्मिक ज़ियारतें भी प्रभावित हो रही हैं। छोटे नोट और बड़े नये नोट न होने की वजह से ज़ायरीन उमरा के लिए मक्का नहीं जा पा रहे हैं। आठ नवंबर के बाद से मक्का जाने वाले सभी समूह या तो रोक दिए गए हैं या फिर कैंसिल कर दिए गए हैं। इस वजह से ज़ायरीन में बेताबी है।

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न्यूज़ नेटवर्क समूह प्रदेश 18 के अनुसार टूर एंड ट्रैवल एजेंसियों का मानना है कि अभी कुछ पता नहीं कि हालात कब तक ठीक होंगे। हमारा तो यह सीज़न ही खराब हो गया है।

सीज़न और अपने आवश्यक व्यवस्था को देखते हुए भारत से बहुत सारे लोग इस दौरान उमरा के लिए मक्का जाते हैं। उमरा करने के लिए जाने का कोई समय निर्धारित नहीं है। लखनऊ स्थित मिर्जा टूर एंड ट्रैवल्स के मालिक मिर्ज़ा मोहम्मद हलीम बताते हैं कि पिछले साल दिसंबर में सीज़न शुरू हुआ था जो जनवरी और फरवरी तक चला था। इस बार नवंबर में ही मौसम शुरू हो गया था। लेकिन अफसोस कि सर मुंडाते ही ओले पड़ने लगे।
9 नवंबर से नोटबंदी के चलते सारी तैयारियां धरी की धरी रह गईं। एयरलाइंस के साथ हर साल जो तैयारी रहती है उसमें भी हमें नुकसान उठाना पड़ा।
दिसंबर से तो हमारे 100-100 लोगों के समूह जाने वाले थे, लेकिन नोटबंदी के चलते लोगों ने कैंसिल करा लिया है। कुछ हैं जिन्हें उम्मीद है कि जल्द ही हालात ठीक होंगे तो उन्होंने दिसंबर। जनवरी की तारीख ले ली है। आगरा के टूर ऑपरेटर मौलाना कलीमुद्दीन बताते हैं कि उमरा के दौरान कम से कम 50 से 60 हजार रुपये का खर्च आता है। रहने खाने की व्यवस्था तो टूर ऑपरेटर ही करा देते हैं। इसके अलावा भी हर किसी के आठ से दस हजार रुपये खर्च हो जाता है।

इसमें चाय पानी से लेकर लोकल आने जाने का किराया और अपने देश में लाने के लिए खजूर और आबे-जमजम सहित अन्य धार्मिक चीज़ें भी ख़रीदनी होती हैं। अलीगढ़ में ट्रैवल एजेंसी चलाने वाले आसिफ अली की मानें तो देश भर से हर महीने 80 हजार से लेकर एक लाख तक ज़ायरीन उमरा के लिए जाते हैं।

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