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न्यायपालिका की आजादी को खतरा है, जिसका एक सुर में विरोध होना चाहिए-चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया

नई दिल्ली। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया टी.एस. ठाकुर ने कहा कि न्यायपालिका के अंदर और बाहर आक्रामकता का खतरा है, जिसका एक सुर में विरोध होना चाहिए। जस्टिस ठाकुर की यह टिप्पणी न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बढ़ते तनाव के मद्देनजर महत्वपूर्ण है।

“जजों की नियुक्ति प्रक्रिया हाईजैक नहीं की जा सकती”

जस्टिस ठाकुर ने कहा कि मौजूदा केंद्र सरकार का जजों की नियुक्ति प्रकिया में रुख संशय भरा है। “स्वतंत्र न्यायपालिका का गढ़” विषयक 37वें भीमसेन सचर स्मृति व्याख्यान के दौरान मुख्य न्यायाधीश ठाकुर ने कहा कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया हाईजैक नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका स्वतंत्र होनी चाहिए क्योंकि शासन की निरंकुशता के दौरान इसकी अपनी भूमिका होती है। ठाकुर ने कहा कि न्यायपालिका जजों के चयन पर कार्यपालिका पर निर्भर नहीं रह सकती है।

जस्टिस ठाकुर ने कहा जब तक इस देश की न्यायपालिका आजाद और स्वायत नहीं होगी , संविधान के तहत चुने गये अधिकारी बेमतब होंगे। हमें न्यायपालिका की आजादी को बरकरार रखने के लिए एकजुट होना होगा।

ठाकुर ने उठाया था जजों की नियुक्ति का मामला

चीफ जस्टिस ठाकुर ने जजों की नियुक्ति का मामला उठाते हुए कहा था कि 500 जजों के पद रिक्त हैं। भारत के अनेक न्यायालय खाली हैं जहां जज उपलब्ध नहीं हैं। ठाकुर के इस बयान पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने असहमति व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि इस साल सरकार ने रिकॉर्ड 120 नियुक्तियां की थी।

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