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‘पंजाब के शेर’, केपीइस गिल नहीं रहे

स्रोत : द हिन्दू

भारत के सबसे मशहूर पुलिस अफसरों में से एक, कंवर पाल सिंह गिल का शुक्रवार को नई दिल्ली में निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे ।

गंगा राम अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक, जहां उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली थी, गिल की किडनी पूरी तरह से ख़राब हो चुकी थी और अचानक दिल का दौरा पड़ने के कारण उनकी मृत्यु हो गयी।

गिल, जो अपने दृढ़ लेकिन विवादस्पद तरीको से पंजाब से आंतकवाद ख़तम करने के लिए ‘पंजाब के शेर’ और ‘सुपर कॉप’ के रूप में जाने जाते हैं, उन्होंने गुजरात और छत्तीसगढ़ सरकारों के सलाहकार के रूप मे भी अपनी सेवाएं प्रदान की थी। वे एक हॉकी प्रशासक और सामाजिक मुद्दों पर बोलने वाले विपुल टीकाकार भी थे। 1989 में एक सिविल सेवक के रूप में उत्कृष्ट कार्यो के लिए उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

गिल ने अपना कैरियर 1958 के आईपीएस बैच में शामिल होकर शुरू किया था और असम में अपने शुरुआती दिनों में प्रसिद्धि हासिल की थी । वहां उनके आक्रामक प्रशासन बनाये रखने के तरीको के कारण उन्होंने अपने कई प्रशंसक और कई आलोचक बनाये।अपने असम के दिनों से गिल नियमित रूप से विवाद में बने रहते थे।

गिल 1984 में अपने राज्य पंजाब लौटे। 1988 से 1990 और 1991 के बीच उन्होंने पंजाब के पुलिस महानिदेशक के रूप मे कार्य किया। पंजाब में अपने प्रवास के दौरान, गिल ने सिख आतंकवाद को कम करने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी।

गिल के पंजाब में आने के बाद पुलिस मुठभेड बढ़ गयी थी। उन्होंने उन पुलिसकर्मियों और सूचनाकारो के लिए इनामो में बढ़त कर दी थी जो आतंकियों को मारने और उनके बारे सूचना
प्रदान करने में मदद करते थे ।

मई 1988 में ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान, गिल ने वास्तविक रूप से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। मीडिया में छाए बिना गिल ने 1988 के ऑपरेशन को अंजाम दिया, जिसमें गोल्डन टेम्पल को बहुत कम नुकसान हुआ जबकि उग्रवादी भारी रूप से मारे गए थे। सरकारी गिनती के अनुसार इस ऑपरेशन मे कम से कम 43 सिख आतंकवादी मारे गए थे और 67 ने आत्मसमर्पण किया था ।

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