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पाकिस्तान की महिला रग्बी टीम ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय रग्बी में हिस्सा लिया

पाकिस्तान की महिला रग्बी टीम ने पहली बार किसी टूर्नामेंट में भाग लिया. पाकिस्तानी लड़कियों ने बीते दिनों लाओस में हुए एशियन सेवन्स रग्बी टूर्नामेंट में शिरकत की और नेपाल को शिकस्त भी दी. वहां खेले गए छह मैचों में पांच में पाकिस्तानी टीम को हार का मुंह देखना पड़ा, पर उनके लिए बड़ी बात यह है कि उन्होंने किसी विदेशी टूर्नामेंट में भाग लिया. कप्तान अज़रा फ़ारूक़ लाहौर के ब्लूमफ़ील्ड हॉल स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर हैं. वे रग्बी के अलावा वॉलीबॉल और फ़ुटबॉल भी खेलती हैं. पाकिस्तान जैसे देश में महिलाओं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रग्बी खेलना बहुत आसान नहीं रहाा. अज़रा ने पाकिस्तान के पंजाब विश्वविद्यालय से फ़िजिकल एजुकेशन में एमए किया.
वे फ़ुटबॉल बचपन से खेलती रही हैं, पर घर वाले इसे लेकर बहुत खुश नहीं थे.

लेकिन, जब दक्षिण एशियाइ खेलों के लिए देश की महिला फ़ुटबॉल टीम में उनका चयन हुआ तो रिश्तेदार भी राजी हो गए. उन्हें बाहर जाने और खुल कर फ़ुटबॉल खेलने की इजाज़त मिल गई. अज़रा खेलती रहीं. पाकिस्तान ने रग्बी की राष्ट्रीय टीम बनाई तो अज़रा को भी मौका मिला. प्रैक्टिस के दौरान उनके खेल से प्रभावित हो कर उन्हें कप्तान ही बना दिया गया. मेहरू ख़ान की राह थोड़ी आसान थी. कनाडा में कुछ साल बिताने वाली मेहरू को परिवार का पूरा समर्थन हासिल था.

पाकिस्तान की राष्ट्रीय टीम में खेलने के बाद मेहरू खेल को बढ़ावा देने के लिए निज़ी एक रग्बी टीम बनाना चाहती हैं. वे कहती हैं, “देश की लड़कियों के लिए रग्बी का अलग कैंप होना चाहिए, उन्हें अलग कोचिंग दी जानी चाहिए.” उन्होंने यह भी कहा कि लाओस टूर्नामेंट के लिए पूरी ट्रेनिंग नहीं हो पाई थी. समय कम मिला था.
अज़रा कहती हैं कि लाहौर की सर्दियों से एकदम लाओस की गर्म मौसम में खेलने के लिए भेज दिया गया था. इससे बेहतर होता कराची में ट्रेनिंग कैंप करवाना, क्योंकि वहां का मौसम लाओस के मौसम की तरह ही है.

इस्लामाबाद स्थित बेकनहाउस स्कूल की क्षेत्रीय स्पोर्ट्स को-ऑर्डिनेटर फ़ैज़ा फ़ारूक़ भी रग्बी के अलावा वॉलीबॉल और फ़ु़टबॉल खेलती हैं. उन्हें घर से विरोध का सामना करना पड़ा. पिता उनके रग्बी खेलने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं. वे चाहते हैं कि उनकी बेटी पढ़ लिख कर घर गृहस्थी संभालें.

फ़ौज़िया फ़ारूक़ को रग्बी खेलने के लिए काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा फ़ैज़ा की मां और उनके बड़े भाई ने उनका साथ दिया. काफ़ी मान मनौव्वल के बाद पिता इस शर्त पर राजी हो गए कि फ़ैज़ा पहले घर का सारा काम काज करेंगी और उसके बाद ही वे खेलने जाएंगी. ख़ैर उन्होंने हार नहीं मानी. उनके दिन की शुरुआत सुबह चार बजे होती थी. घर के तमाम काम करने के बाद वे पढ़ाई करतीं और उसके बाद खेलने जातीं. स्कूल से लौटने के बाद फिर वही सारा काम एक बार फिर करना होता. फ़ैज़ा को अमरीकी दूतावास का वजीफ़ा मिला और कोचिंग के लिए अमरीका जाने का मौका. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ था. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.
पाकिस्तानी लड़कियां भारतीय महिला रग्बी टीम से काफ़ी प्रभावित हैं. उनका कहना है कि भारत और दक्षिण कोरिया की टीमें जम कर खेलीं और वे काफ़ी तैयारी के साथ टूर्नामेंट में उतरी थीं. लेकिन वे अपनी टीम से भी ख़ुश हैं. इनका मानना है कि पाकिस्तानी लड़कियों को जैसे-जैसे मौके मिलेंगे, उनका खेल निखरता चला जाएगा और वे बेहतर खेल पाएंगी.

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