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पानी और पर्यावरण के लिये लड़ने वाले अनुपम मिश्र नहीं रहे

जाने-माने लेखक, गांधीवादी, पर्यावरणविद, संपादक और छायाकार अनुपम मिश्र का निधन हो गया है। उन्होंने सोमवार तड़के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में आखिरी सांस ली। वह 68 वर्ष के थे।

उनकी अचानक हुई मौत के बाद फेसबुक में उनके जानने वालों ने उनकी शख्सियत को याद करते हुई फेसबुक पोस्ट लिखी।हर पोस्ट के जरिये उनकी शख्सियत के हर पक्ष को समझा जा सकता है।
एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एडिटर प्रियदर्शन के फेसबुक वॉल पर उनको याद करते हुए लिखते हैं

अनुपम मिश्र स्मार्टफोन और इंटरनेट के इस दौर में चिट्ठी-पत्री और पुराने टेलीफोन के आदमी थे। लेकिन वे ठहरे या पीछे छूटे हुए नहीं थे। वे बड़ी तेजी से हो रहे बदलावों के भीतर जमे ठहरावों को हमसे बेहतर जानते थे।

जब भी उनका फोन आता, मुझे लगता कि मैं अपने किसी अभिभावक से बात कर रहा हूं जिसे इस बात की सफाई देना जरूरी है कि मैंने वक्त रहते यह काम या वह काम क्यों नहीं किया है। तिस पर उनकी सहजता और विनम्रता बिल्कुल कलेजा निकाल लेती।उनको देखकर समझ में आता था कि कमी वक्त की नहीं हमारी है जो हम बहे जा रहे हैं।

वे मौजूदा सामाजिक पर्यावरण में ओजोन परत जैसे थे। उनसे ऑक्‍सीजन मिलती थी, यह भरोसा मिलता था कि तापमान कभी इतना नहीं बढ़ेगा कि दुनिया जीने लायक न रह जाए।

लेकिन मौत पिछले कई दिनों से कैंसर की शक्ल में उन्हें कुतर रही थी। हम तमाम लोग इस अपरिहार्य अघटित से आंख नहीं मिला पा रहे थे। यह वाक्य अंतत: लिखना पड़ रहा है कि अनुपम मिश्र नहीं रहे। बस, प्रणाम।

पत्रकार पंकज चतुर्वेदी अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं-
अनुपम बाबु आज सुबह पांच चालीस बजे अपनी अंतिम अनंत यात्रा पर निकल पड़े। अनुपम भाई , यानि अनुपम मिश्र, – जब सरकार को पर्यावरण जैसे किसी शब्द कि परवाह नहीं थी, तब उन्होंने गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में पर्यावरण कक्ष स्थापित कर दिया था।
अस्सी के दशक में उनकी पुस्तक हमारा पर्यावरण, हिंदी में देश के समग्र पर्यावरण अध्ययन का पहला दस्तावेज था। “आज भी खरे हें तालाब” ने टो समाज और सरकार कि जल संरक्षण के प्रति दिशा ही बदल दी।
कथेतर साहित्य में हिंदी में सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक के लेखक, एक संवेदनशील इंसान, प्रख्यात कवि भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे अनुपम भाई का जन्म १९४६ ऐसा वर्धा में हुआ था. उन्हें चंद्रशेखर आजाद राष्ट्रीय पुरस्कार, जमनालाल बजाज पुरस्कार, इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार सहित कई सम्मान मिले, लेकिन वे अपनी लेखनी, समय, शक्ति केवल समाज के लिए लगाते रहे।

पिछले साल जब उन्हें प्रोस्टेट का केंसर उभरा टो भी वे इस दर्द को सह कर भी काम में लगे रहे। आज सुबह दिल्ली के आल इंडिया मेडिकल साईंस में उनका शारीरिक अवसान , देश, समाज के लिए अपूरणीय क्षति है।

सचिन जैन फेसबुक पोस्ट पर लिखते हैं-
पानी और पर्यावरण की एक अलग ही समझ विकसित करने वाले और भाषा के समाज से रिश्तों को सामने लाने वाले बहुत सहृदय और स्पष्ट व्यक्ति आदरणीय अनुपम मिश्र जी हमारे बीच नहीं रहे। वे गांधी मार्ग पत्रिका के संपादक थे। उन्होंने आज भी खरे हैं तालाब, राजस्थान की रजत बूँदें सरीखी किताबें रची। आज के समाज में उन्होंने अहिंसा को सचमुच जिया, जो कहा वह किया। हमारे लिए अपूर्णीय निजी क्षति। आपको नमन अनुपम भाई।

पत्रकार शाहनवाज मलिक अपनी फेसबुक वॉल में उनको याद करते हुए लिखते हैं-

जब भी तालाब पर लिखना या लिखवाना होता, पहला नाम ज़ेहन में अनुपम मिश्र का आता। वो देश में तालाबों के चलता-फ़िरता इनसाइक्लोपीडिया थे। पंजाब, राजस्थान, गुजरात में तालाब बचाने और बनाने की अनगिनत कहानियां एक सांस में सुना जाते थे।और ऐसे सुनाते कि लगता फूल झड़ रहे हैं। सादगी भरी ज़िंदगी तो सचमुच उन्होंने ही जी। जब भी मैं मिलने गया तो उन्होंने ढेर सारी छोटी-बड़ी किताबें दीं. दो साल पहले बाहरी दिल्ली में एक तालाब पाटा जा रहा था तो मैंने उन्हें फ़ोन किया. पहली बार उन्हें गुस्से में सुना. बोले कि पट जाने दो। सब ख़त्म हो जाने दो. व्यवस्था से नाख़ुश थे। उनका अचानक जाना किसी सदमे से कम नहीं।

अनुपम जी को आख़िरी सलाम गांधी शांति प्रतिष्ठान में अभी 1 बजे दिया जाना है। फिर यहीं से उन्हें निगमबोध घाट ले जाया जाएगा।

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