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पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में नोटबंदी का असर, भूखमरी के कगार में पहुंच गये हैं बुनकर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जैनुल आबेदीन भूखमरी के कगार पर पहुंच गये हैं। रेशमी कपड़े की बुनाई करने वाले जैनुल नोटबंदी के बाद उनका धंधा चौपट हो गया है। वाराणसी छोटे कामगारों के लिये जाना जाता है नोटबंदी के बाद इसका असर इन छोटे उघोगों के कामगारों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है।

नोटबंदी के बाद  वाराणसी में  कपड़ा बुनने वाले दिहाड़ी मजदूर काम की कमी झेल रहे हैं। शहर के हालात ये हैं कि कपड़ा बुनने वाले दिहाड़ी मजदूर दिन के 250 रूपये भी नहीं कमा पा रहे जिससे की वह अपने बच्चों को रोटी खिला सके। वाराणसी के अलावा यहीं स्थिति कमोबेश यूपी के अन्य जिलों में भी बनी हुई है जिसमें अलीगढ़, मुरादाबाद व अन्य जिले आते है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक , प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जैनुल आबेदीन इन दिनों बेरोजगार हैं। आबेदीन उन कामगारों में से है जिनका काम नोटबंदी के बाद ठप पड़ चुका है।

वाराणसी के मशहूर रेश्मी कपड़े बनाने वाले आबेदीन कहते हैं कि मोदी के नोटबंदी के फैसले ने हमारी कमर तोड़ दी है। अब ज्यादा दिनों तक अपने बच्चों को खिला नहीं पाऊंगा। ऐसे ही चला तो हम बुनकर एक महीने से ज्यादा जिंदा नहीं रह पाएंगे।

आबेदीन की तरह और भी लोग हैं जो 250 रुपये प्रति दिन कमाते हैं, लेकिन अगर इन्हें साथ जोड़ दें तो यह 1 खरब रुपये की इकॉनमी बन जाती है, जो इंडोनेशिया की इकॉनमी से ज्यादा है।

जबकि इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अर्थशास्त्रियों और एशियन डिवेलपमेंट बैंक ने इस साल से लेकर मार्च तक इकनॉमी में गिरावट का अनुमान लगाया है। वहीं रिजर्व बैंक ने इसे लेकर बेहद चौकस है। उसने अनुमान लगाया है कि नोटबंदी का प्रभाव थोड़े समय के लिए ही पड़ेगा। मगर फिर भी ज्यादा डेटा की समीक्षा करनी पड़ेगी। जो पैसा रिप्लेस किया जा रहा है, उसकी प्रक्रिया नए बिल्स, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और सरकारी खर्च में बढ़ावा है, जिसमें महीनों का वक्त लगेगा।

सरकार सब्ज़ाबाग तो दिखा देती है लेकिन असल समस्या है कि वाराणसी के बुनकरों का कामकाज अनौपचारिक व्यवसायों में से एक है और इसमें भुगतान का तरीका भी अलग है। जब साड़ी बनाने वाले अॉर्डर डिलीवर करते हैं तो उन्हें एक बेयर चेक मिलता है। बैंक में पहुंचने से पहले साहूकार के हाथों से यह न जाने कितने ही सप्लायर्स के अकाउंट्स से गुजरता है।

 

 

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