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पुन्यतिथि विशेष: फ़िल्मी दुनिया के शाहजहाँ थे प्रदीप कुमार

प्रदीप कुमार (फ़िल्म आरती के एक द्रश्य में)

भारतीय सिनेमा का गोल्डन पीरियड 1950 से 1970 तक के दौर को कहा जाता है और उसी दौर में प्रदीप कुमार जैसा एक अदाकार भी था जिसने अपने शानदार अभिनय का लोहा पूरे सिनेमा जगत को मनवाया. उस दौर में जबकि दिलीप कुमार, देव आनंद, गुरु दत्त जैसे कलाकार मौजूद थे उस दौर में अपनी पहचान बनाना कमाल की बात ही कही जा सकती है. ताजमहल में उन्होंने मुग़ल बादशाह शाहजहां का किरदार निभाया जिसमें उनकी ख़ूब सराहना की गयी.

विकिपीडिया के अनुसार प्रदीप कुमार का जन्म पश्चिम बंगाल में 4 जनवरी 1925 को ब्राह्मण परिवार में हुआ था. शीतल बटावली उर्फ प्रदीप कुमार बचपन से ही फिल्म अभिनेता बनने का सपना देखा करते थे। इस ख्वाब को पूरा करने के लिए वह रंगमंच से जुड़े. हालांकि इस बात के लिए उनके पिताजी राजी नहीं थे। वर्ष 1944 में उनकी मुलाकात निर्देशक देवकी बोस से हुई जो एक नाटक में प्रदीप कुमार के अभिनय को देखकर काफी प्रभावित हुए. उन्हें प्रदीप कुमार से एक उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया और उन्होंने अपनी बंगला फिल्म अलखनंदा में उन्हें काम करने का मौका दिया.

प्रदीप कुमार हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर अभिनेता थे. उन्हें हिन्दी सिनेमा में ऐसे अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है जिसने 1950 और साठ के दशक में अपने ऐतिहासिक किरदारों के ज़रिये दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया. उस ज़माने में फिल्मकारों को अपनी फिल्मों के लिए जब भी किसी राजा, महाराजा, राजकुमार अथवा नवाब की भूमिका की जरूरत होती थी तो वह प्रदीप कुमार को याद किया जाता था। उनके उत्कृष्ट अभिनय से सजी अनारकली, ताजमहल, बहू बेगम और चित्रलेखा जैसी फिल्मों को दर्शक आज भी नहीं भूले हैं.

फिल्म अलखनंदा से प्रदीप कुमार नायक के रूप में अपनी पहचान बनाने में भले ही सफल नहीं हुए लेकिन अभिनेता के रूप में उन्होंने सिने कैरियर के सफर की शुरूआत कर दी। इस बीच प्रदीप कुमार ने एक और बंगला फिल्म भूली नाय में अभिनय किया। इस फिल्म ने सिल्वर जुबली मनायी. इसके बाद उन्होंने हिंदी सिनेमा की ओर भी अपना रुख कर लिया। वर्ष 1949 में प्रदीप कुमार अपने सपने को साकार करने के लिए मुंबई आ गये और कैमरामैन धीरेन डे के सहायक के तौर पर काम करने लगे 1 वर्ष 1949 से 1952 तक वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। प्रदीप कुमार को फिल्मों में नायक बनने का नशा कुछ इस कदर छाया हुआ था कि उन्होंने हिंदी और उर्दू भाषा की तालीम हासिल करनी शुरू कर दी.

फिल्म अलखनंदा के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली, वह उसे स्वीकार करते चले गये। इस बीच उन्होंने कृष्णलीला, स्वामी, विष्णुप्रिया और संध्या बेलार रूपकथा जैसी कई फिल्मों में अभिनव किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बाक्स आफिस पर सफल नहीं हुई. वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आनंद मठ में प्रदीप कुमार पहली बार मुख्य अभिनेता की भूमिका में दिखाई दिये. हालांकि इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर जैसे महान अभिनेता भी थे। फिर भी वह दर्शकों पर अपने अभिनव की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फिल्म की सफलता के बाद प्रदीप कुमार बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए.

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