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प्रोफेसर सय्यदा जाफ़र की तमाम तसानीफ़ के मजमूआ की इशाअत का फ़ैसला

हैदराबाद 26 जुलाई: मुदीर आला रोज़नामा सियासत ज़ाहिद अली ख़ान ने प्रोफेसर सय्यदा जाफ़र साबिक़ सदर शोबा उर्दू उस्मानिया यूनीवर्सिटी हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी की तमाम तसानीफ़ पर मुश्तमिल एक जामिआ किताब तैयार करने की तजवीज़ पेश की जिसको किताब की शक्ल में इदारे सियासत की तरफ से शाय किया जाए गा और तरफ ज़ाहिद अली ख़ान ने ये ज़िम्मेदारी प्रोफेसर अशर्फ़ रफ़ीअह सदर शोबा उर्दू उस्मानिया यूनीवर्सिटी को सौंपी इदारे सियासत के गोल्डन जुबली हाल में इदारे सियासत और कुल हिंद नहज अलबलाग़ा सोसाइटी के ज़ेरे एहतेमाम प्रोफेसर सय्यदा जाफ़र मरहूमा साबिक़ सदर शोबा उर्दू उस्मानिया यूनीवर्सिटी हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी की याद में मुनाक़िदा ताज़ियती नशिस्त से सिदराती ख़िताब के दौरान ज़ाहिद अली ख़ान ये एलान किया।

क़ारी सय्यद हुसैन मूसवी की क़िरात कलाम पाक से इस ताज़ियती नशिस्त का आग़ाज़ हुआ जबकि शौकत अली मिर्ज़ा सदर कुल हिंद नहज अलबलाग़ा ने ख़ुतबा इस्तिक़बालीया पेश किया और प्रोफेसर अशर्फ़ रफ़ी मुईद जावेद सदर शोबा उर्दू उस्मानिया यूनीवर्सिटी प्रोफेसर एस ए शकूर डॉ ट्रक्टर माइनॉरिटी एजूकेशन डिपार्टमेंट ने अपने खिताबात के ज़रीये मरहूमा के ख़िदमात को ख़राज अक़ीदत पेश किया। ज़ाहिद अली ख़ान ने अपने ख़िताब में कहा कि मरहूमा मेरी उस्ताद थीं और दक्कनी अदब में उन के ख़िदमात नाक़ाबिले फ़रामोश हैं।

ज़ाहिद अली ख़ान ने बताया कि वो उस वक़्त इदारे सियासत के इश्तिराक से आधे मवाज़ाने पर निज़ाम अदब की रियायती इशाअत की थी। उन्होंने कहा कि मरहूमा के अदबी ख़िदमात और दक्कनी ज़बान के फ़रोग़ में उन के काम कभी फ़रामोश नहीं किए जा सकें गे। ज़ाहिद अली ख़ान ने कहा कि ऐसी अज़ीम अदबी शख़्सियत हैदराबाद के बजाये दिल्ली या लखनऊ में पैदा होती तो उन्हें पदमा श्री और पदमा भूषण जैसे बाबिक़ार ऐवार्ड से नवाज़ जाता। ज़ाहिद अली ख़ान ने कहा कि दक्कनी मख़तूतात को जमा करने और उन्हें तर्तीब देने का अहम कारनामा भी मरहूमा ने अंजाम दिया है।

मुदीर आला ज़ाहिद अली ख़ान ने कहा कि इसी तरह अब तक अठारह ता बीस हज़ार नादिर वकमयाब किताबों पर मुश्तमिल एक लायब्रेरी तैयार है। उन्होंने कहा कि ज़बान के साथ कभी नाइंसाफ़ी नहीं हो सकती और ना ही उर्दू को ख़त्म किया जा सकता है बशर्तिके उर्दू दां तबक़े इस ज़बान को अपनी माँ की तरह मुहब्बत करे। उन्होंने कहा कि रूस ने उज़बेकिस्तान ताजिकस्तान पर क़बज़े करके वहां की फ़ारसी ज़बान को बदल कर रूसी ज़बान को सरकारी ज़बान का दर्जा दिया था मगर 70 साल बाद भी किया हुआ सारी दुनिया ने देखा और आज उज़बेकिस्तान और ताजिकस्तान की सरकारी ज़बान दुबारा से फ़ारसी है।

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