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फंसाए गए, पीटे गए, छोड़े गए: सभी के सभी मुसलमान थे

आतंकवाद के नाम पर अक्सर मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार किया जाता रहता है | ट्रायल शुरू होने से पहले ही इन युवाओं को मीडिया और सुरक्षा एजेंसीयां आम जनता के बीच आतंकवादियों के रूप में प्रचारित कर देती हैं | “हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है, लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान है” जैसे ज़हरीले विचार को देश की चेतना में अन्दर तक स्थापित कर दिया गया है । कोई तथ्यों को जानने की दिलचस्पी ही नहीं रखता |

आज पूरा देश भोपाल एनकाउंटर पर आवाज़ उठा रहा है | लोग सवाल कर रहे हैं कि ऐसी क्या वजह थी जिसके कारण पुलिस ने आरोपियों को पॉइंट ब्लेंक रेंज पर गोली मार कर उनकी हत्या की? शुरुआत में मीडिया संगठनों ने इन आरोपियों को भी आतंकवादी कहा था – जो वास्तव में विचाराधीन कैदी थे | ये औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद निर्दोष भी साबित हो सकते थे |

कथित एनकाउंटर के फौरन बाद, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौड़ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया एक लम्बा समय लेती है, इसलिए न्याय के लिए आतंकवादियों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए जाएँ | उन्होंने इस एनकाउंटर के लिए मध्य प्रदेश पुलिस की तारीफ़ भी की |

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया बहुत समय लगाती है जिससे आतंकवादियों और आतंकी संगठनों को फलने फूलने का वक़्त मिल जाता है |

भोपाल एनकाउंटर के बाद, नारदा न्यूज़ के फोटो एडिटर विजय पाण्डेय ने छह पीड़ितों का प्रोफाइल साझा किया है, जिनको वर्षों तक जेल में रखा गया और उसके बाद उन्हें क्लीन चिट दे दी गयी |

निसरुद्दीन
निसारुद्दीन

निसारुद्दीन अहमद

“मैंने अपनी ज़िन्दगी के बेशकीमती 8,150 दिन जेल के अन्दर बिताये हैं”

नाम: निसारुद्दीन अहमद

केस: बाबरी मस्जिद बरसी बम विस्फोट

गिरफ़्तारी: 15 जनवरी 1994

रिहाई: मई 2016

जेल में वर्षों की संख्या: 23 वर्ष

निसारुद्दीन अहमद पर बाबरी मस्जिद की शहादत की पहली बरसी की पूर्व संध्या पर ट्रेनों में पांच विस्फोट में शामिल होने का आरोप लगा कर गिरफ्तार किया गया था | इस घटना में दो यात्रियों की मौत और आठ लोग घायल हो गए थे |

निसार को जब वह सलाखों के पीछे डाला गया था तब वह 20 साल का भी नहीं था। अब, वह 43 साल का है।

जेल से रिहा होने के बाद निसार ने कहा था, “मैंने अपनी ज़िन्दगी के बेशकीमती 8,150 दिन जेल के अन्दर बिताये हैं | मेरे लिए ज़िन्दगी ख़तम हो चुकी है | अभी आप जिसे देख रहे हैं वह महज़ एक जिंदा लाश है |”

“15 दिनों के बाद मेरी परीक्षा थी, मैं कॉलेज के लिए जा रहा था था। रास्ते में एक पुलिस वाहन इंतजार कर रहा था। एक आदमी ने मुझे अपनी रिवॉल्वर दिखाई और मुझे गाड़ी में बैठने के लिए मजबूर कर दिया। कर्नाटक पुलिसको मेरी गिरफ्तारी के बारे में पता नहीं था। यह टीम हैदराबाद से आई थी। ये मुझे हैदराबाद ले गए, “निसार ने बताया।

निसार को 28 फरवरी 1994 को अदालत में पेश किया गया था।

ज़हीरुद्दीन
ज़हीरुद्दीन

ज़हीरुद्दीन अहमद

नाम: ज़हीरुद्दीन अहमद

गिरफ्तारी: अप्रैल 1994

जमानत: मई 2008 के चिकित्सा के आधार पर

जेल में वर्षों की संख्या: 14 वर्ष

अंत में बरी कर दिया

 

निसारुद्दीन अहमद के बड़े भाई ज़हीरुद्दीन, जो एक सिविल इंजीनियर के रूप में मुंबई में काम कर रहे थे, उन्हें अप्रैल में उठाया गया था। निसार की तरह, जहीर को भी, आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी लेकिन स्वास्थ्य के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2008 को उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया – जेल में उनके फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित होने का पता चला था।

पुलिस के पास टाडा के प्रावधानों के तहत उनके खिलाफ अदालत में दाखिल करने के लिए सुबूत के रूप में केवल हिरासत में लिए गए इकबालिया बयान थे । निसार, जहीर और यूसुफ के इन कथित इकबालिया में पुलिस ने दावा किया था कि निसार ने 06/12/1993 को  A.P. एक्सप्रेस के डिब्बे में बम रखने में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी और उसके पास दो अन्य बम भी थे जो के.के. एक्सप्रेस उपयोग के लिए बने थे, लेकिन अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से वह उन का उपयोग नहीं कर सका “।

अपनी रिहाई पर, निसार ने कहा, “मेरी आजादी वापस देने के लिए मैं सुप्रीम कोर्ट का आभारी हूँ। लेकिन मेरी ज़िन्दगी वापस कौन देगा? ”

अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन, जिन्होंने निसार और जहीर सही पांच आरोपियों का शीर्ष अदालत में मुकदमा लड़ा, ने कहा कि उनके पुलिस हिरासत में कथित इकबालिया बयान ही मामले की शुरुआत और अंत हैं।

जहीर के बारे में, फैसले में कहा: “किसी भी तरह के सुबूत के अभाव में, सिर्फ सह आरोपी के इकबालिया बयान के आधार पर सज़ा को बरकरार रखना हमारे लिए बेहद मुश्किल है |”

aamir
मोहम्मद आमिर खान

मोहम्मद आमिर खान

नाम: मोहम्मद आमिर खान

केस: हत्या, राजद्रोह और भारतीय राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने सहित दिल्ली में 17 मामलों का आरोप लगाया गया। आरोपों में हरियाणा में दो विस्फोट और 1996 में गाजियाबाद में फ्रंटियर मेल (ट्रेन) में एक विस्फोट भी शामिल थे।

गिरफ्तारी: फरवरी 1998

रिहाई: जनवरी 2012

जेल में बिताये साल: 14 साल

 

1998 में फरवरी की एक रात को, मोहम्मद आमिर खान, पुरानी दिल्ली के एक निवासी, दवा खरीदने के लिए एक दवा की दुकान पर जा रहे थे।

रास्ते में उन्हें पुलिस ने जबरदस्ती उठा लिया और जीप में बैठा कर छोटे से कमरे में ले जाया गया, जहां उन पर बहुत अत्याचार किये गये और खाली कागजात पर हस्ताक्षर कराये गए।

खान पर हत्या, आतंकवाद और राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ने सहित 19 मामलों में आरोप लगाया गया था। उन पर दिसंबर 1996 और दिसंबर 1997 के बीच दिल्ली और पड़ोसी राज्यों में हुए बम विस्फोटों की साजिश रचने का आरोप लगाया गया था।

उनके परिवार ने अपने बेटे को बाहर निकालने के लिए जो कुछ उनके पास था सब लगा दिया | ट्रायल के दौरान उनके पिता की मौत हो गयी और जब आमिर रिहा हुए तब उनके परिवार में सिर्फ बीमारी माँ ही बची थी |

अपनी रिहाई पर आमिर ने कहा था, “सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादियों के लिए पुनर्वास नीति बनाई हुयी है लेकिन ऐसी कोई नीति उन बेगुनाहों के लिए क्यों नहीं है जिन्हें फर्जी मामलों में फंसा कर सालों तक जेल में रखा जाता है”|

 

डॉ सलमान फ़ारसी
डॉ सलमान फ़ारसी

डॉ सलमान फारसी

नाम: डॉ सलमान फारसी

केस: मालेगांव ब्लास्ट 2006

गिरफ्तारी: 5 नवंबर, 2006

बरी होने की तारीख: अप्रैल 2016

जेल में बिताये साल: 5 साल

 

फारसी, मालेगांव निवासी है और बीयूएमएस स्नातक हैं | वह गोवंडी, मुंबई, में अपने क्लिनिक में काम कर रहे थे जब उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी गयी। महाराष्ट्र एटीएस ने उन्हें 5 नवंबर 2006 को हुए बम विस्फोटों में संलिप्तता का आरोप लगाते हुए उठाया था। आठ अन्य मुस्लिम युवकों के साथ डॉ फारसी को सीरियल ब्लास्ट की साजिश रचने और विस्फोट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। महाराष्ट्र एटीएस ने दावा किया था कि वे प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (सिमी) के सदस्य थे।आरोप पत्र में यह कहा गया था कि आरोपी महाराष्ट्र राज्य के भीतर अवैध गतिविधियों के ज़रिये सांप्रदायिक दंगे करा कर सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते थे।

नवंबर 2011 में जेल में पांच साल बिताने के बाद, डॉ फारसी सहित सभी युवाओं को जमानत दे दी गई थी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उनकी जमानत का विरोध नहीं किया और इसकी जगह विस्फोटों के लिए हिंदू कट्टरपंथियों को आरोपी बनाया।

“ज़मानत देने में काफी वक़्त लगाया गया था और मेरा साथ अभी पूरा न्याय नहीं हुआ है क्योंकि मुझे पूरी तरह दोषमुक्त किये जाना बाकि है, ” डॉ फारसी ने अपनी रिहाई पर कहा |

 

शोएब जागीरदार
शोएब जागीरदार

शोएब जागीरदार

नाम: शोएब जागीरदार

केस: मक्का मस्जिद ब्लास्ट

गिरफ्तार: 26 जून 2007

बरी किया गया: जुलाई 2014

जेल में साल: 7

 

शोएब जागीरदार, जो महाराष्ट्र के जालना के निवासी है, उन्हें 26 जून, 2007 को हैदराबाद पुलिस के विशेष जांच दल ने गिरफ्तार कर किया था | शोएब साथ उनके चचेरे भाई इमरान, दोस्तों नईम और रफी अहमद को भी गिरफ्तार किया था| उन पर आपराधिक साजिश, राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने और फर्जी पासपोर्ट हासिल का आरोप लगाया गया था। पुलिस ने शोएब पर नईम की मदद करने के साथ आरोप लगाया था, जो लश्कर-ए-तैयबा का कार्यकर्ता बताया गया था।

हैदराबाद में ऐतिहासिक मक्का मस्जिद को हिलाकर रख देने वाले विस्फोट के लगभग सात साल बाद और सीबीआई के इस घटना में हिंदू कट्टरपंथियों की संलिप्तता उजागर करने के पांच साल बाद, हैदराबाद की एक अदालत ने चार लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश और बम विस्फोट के मामले में कर दिया था।

सीबीआई ने साजिश रचने और 18 मई, 2007 को जुमे की नमाज़ के वक़्त मस्जिद में विस्फोट के आरोप में लोकेश शर्मा, देवेंद्र गुप्ता और आरएसएस कार्यकर्ता स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार किया था।

सैयेद वासिफ हैदर
सैयेद वासिफ हैदर

वासिफ हैदर

नाम: वासिफ हैदर

केस: 14 अगस्त 2000 को कानपुर में बम विस्फोट

आरोप में गिरफ्तार: जुलाई 2001

बरी: 2009 में

जेल में साल: 8

 

सैयद वासिफ हैदर, कानपुर, उत्तर प्रदेश  के एक निवासी, 14 अगस्त, 2009 को सभी आरोपों से बरी होने से पहले आठ साल के लिए जेल में बंद थे | अपनी गिरफ्तारी के समय, हैदर 29 साल के थे | वे अपने माता-पिता के इकलौते  बेटे| गिरफ्तार किये जाने के वक़्त वह एक गर्भवती पत्नी और तीन बच्चों को पीछे छोड़ गए थे|

“आज मैं बेरोजगार हूँ। मैं व्यवसाय शुरू नहीं कर सकता, क्योंकि दोस्तों ने मुझे लोन देने से इंकार कर दिया है। जहाँ भी मैं एक नौकरी की तलाश में जाता हूँ, मेरे जेल में बिठाये आठ साल के बारे में जानने के बाद, कंपनियों मुझे कहती हैं कि वे मुझे कॉल करेंगे। लेकिन उनका कॉल कभी नहीं आता।”

“मुझे बदनाम करने से मीडिया को रोकिये। मैं 2009 में निर्दोष घोषित किया गया था, फिर भी, स्थानीय मीडिया जब भी कहीं भी विस्फोट होता है उसमें मेरा नाम खींच लेता है। मैं एक सामाजिक बहिष्कार का शिकार हूँ। इलाके में रहने वाले अपने बच्चों को एक “आतंकवादी” की बेटी के साथ खेलने नहीं देते हैं। रिश्तेदारों को महसूस होता है कि अगर वे मुझसे मिलेंगे तब पुलिस उन्हें परेशान करेगी, “हैदर ने कहा।

 

मूल लेख नारदा न्यूज़ की वेबसाइट पर छपा है जिसका सियासत के लिए हिंदी अनुवाद मुहम्मद ज़ाकिर रियाज़ ने किया है 

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