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बड़बोले ट्रंप का ओबामा के शातिरपने से अंदाज़ अलहदा है

डोनाल्ड जे. ट्रम्प अंकल ने ट्वीट किया है कि अमेरिका को अपनी परमाणु क्षमता तब तक मज़बूत करनी चाहिए, जब तक कि परमाणु हथियारों के मामले में दुनिया की अक्ल ठिकाने न आ जाए। इस पर बावेला मचना स्वाभाविक ही है। अमेरिकी लिबरल कॉरपोरेट अख़बारों का कहना है कि यह एक बड़े नीतिगत परिवर्तन का संकेत है, क्योंकि ओबामा प्रशासन परमाणु हथियारों में कटौती के लिए प्रयासरत है। लेकिन, इसे थोड़ा समझने की ज़रूरत है।

राष्ट्रपति बराक ओबामा कुछ महीनों पहले जब हिरोशिमा गए थे, तो उन्होंने परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया की बात कही थी। तब यह भी चर्चा थी कि ऐसे हथियारों के आधुनिकीकरण और प्रबंधन में अगले एक दशक में 350 बिलियन डॉलर ख़र्च करने की अमेरिका की योजना है। अन्य रिपोर्ट बताते हैं कि मौज़ूदा हिसाब-किताब से तीन दशकों में एक ट्रिलियन डॉलर ख़र्च होगा। तब उम्मीद की गयी थी कि जाते-जाते ओबामा इस ख़र्च में कमी करने के लिए ठोस योजना बनायेंगे।लेकिन अमेरिकी इतिहास में सबसे अधिक ख़तरनाक हथियार बेचनेवाले राष्ट्रपति से की गयी यह उम्मीद भी बेकार गयी, और घूम-घूम कर परमाणु ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा के नाम पर परमाणु तकनीक और तबाही के अन्य सौदे बेचते रहे।

अब कहने के लिए रूस से उनकी ‘न्यू स्टार्ट’ संधि, परमाणु सुरक्षा सम्मेलन, ईरान समझौता आदि को गिनाया जा सकता है। पर इन मामलों में कटौती या कमी जैसी कोई बात नहीं थी, बस आर्थिक कमाई और साम्राज्यवादी वर्चस्व की चिंताएं थीं। आप याद कर सकते हैं, जब मशहूर व्हाइट हाउस पत्रकार मरहूम हेलेन थॉमस ने एक सवाल ओबामा से उनके पहले व्हाइट हाउस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पूछा था- ‘मध्य-पूर्व में किस देश के पास परमाणु हथियार हैं?’ ओबामा सीधे-सीधे न कह कर परमाणु हथियारों पर रोक और रूस के सहयोग की चलताऊ बातें कह कर कट लिये थे।

यह स्वाभाविक ही था क्योंकि उन्हें ताक़तवर इज़रायली लॉबी की परवाह थी. थॉमस ने बहुत बाद में कहा था कि ओबामा में साहस की कमी है और वे लिबरल नहीं हैं। बहरहाल, इस साल मार्च में ओबामा ने वाशिंग्टन पोस्ट में एक लेख लिख कर दावा किया था कि 2018 तक दुनिया में रूसी और अमेरिकी परमाणु वारहेड्स की संख्या 1950 के दशक के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच जायेगी। ऐसे हथियारों की संख्या 1980 के दशक में 23 हज़ार से ऊपर पहुंच गयी थी। लेकिन, इस कमी में ओबामा प्रशासन का कोई ख़ास योगदान नहीं है।

वर्ष 2010 में जब उन्होंने रूस से संधि की थी, तब ऐसे वार हेड्स की संख्या 4,950 थी, जो 2015 में 4, 700 हो गयी, यानी मात्र पांच फ़ीसदी कम। हालांकि जानकार बताते हैं कि दुनियाभर में तैनात अमेरिकी वार हेड्स की असली संख्या सात से आठ हज़ार है। ख़ैर, 4,700 से भी आप दुनिया को कई बार तबाह कर सकते हैं। यह उल्लेख ज़रूरी है कि कटौती के मामले में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश का रिकॉर्ड ओबामा से बहुत अच्छा है। वर्ष 2000 में अमेरिका के पास 10 हज़ार से अधिक ऐसे हथियार थे, जो बुश के जाते-जाते पांच हज़ार से कुछ ज़्यादा रह गए थे। ध्यान रहे, तकनीक में बेहतरी के साथ कम हथियार अधिक प्रभावी और कम ख़र्चीले हो रहे हैं। कटौती की चर्चा के साथ इस बात का संज्ञान रखना ज़रूरी है। आंकड़े और विश्लेषण और भी हैं। अभी तो बस यह कि ट्रंप बड़बोले हैं, और ओबामा के शातिरपने से उनका अंदाज़ अलहदा है। चीज़े वैसे ही चलती रहेंगी। और हां, भारत का न्यूक्लियर लॉबी बुश और ओबामा से ख़ुब ख़ुश रहा है, ट्रंप के साथ भी मज़ा करेगा, और आप और हम क्लिन एनर्जी के झांसे में फंसाये जाते रहेंगे।

दवा से फ़ाएदा मक़्सूद था ही कब कि फ़क़त
दवा  के  शौक़  में  सेहत  तबाह  की  मैं  ने

-जौन एलिया

प्रकाश के. रे की फेसबुक वॉल से

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