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बरखा दत्त ने लेख में बताया, “नोटबंदी के चक्कर में मोदी ने भारत को 1970 के दशक में धकेल दिया”

एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार बरखा दत्त ने अमेरिका के वॉशिंगटन पोस्ट में एक लेख लिखा है। जिसमें बरखा दत्त ने बताया है कि बीजेपी के मार्केटिंग कंसलटेंट सुनील अलघ ने प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के फैसले पर कहा, भारत में कुछ ज्यादा ही डेमॉक्रेसी है, इसलिए मुश्किल फैसले नहीं लिए जाते।

नोटबंदी के कारण देश में उपजे मुश्किलों के इस माहौल पर नोटबंदी और इससे उपजी परेशानी पर बरखा अपना एनालिसिस करते हुए लिखा है कि भारत ऐसा देश है जिसमें 90 प्रतिशत ट्रांजेक्शंस कैश में होती हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने 4 घंटे पहले इस बात की जानकारी दी कि 500 और 1000 रुपये के नोट बंद कर दिए गए हैं। नोटबंदी के पीछे मोदी जी ने जो मकसद बताया था उसका पता नहीं पूरा हुआ के नहीं। लेकिन खराब संपर्क और प्लानिंग के कारण लोगों को लंबी कतारों में लगना पड़ा। इस की वजह से लोगों की जाने गई हैं। बरखा के मुताबिक हमें सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन जैसा कोई शख्स चाहिए, जिनके बारे में काफी सुना जा सकता है।

इसके बाद बरखा 1971 को याद करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भाषण और पीएम मोदी के भाषण में सामान्तर विषय पर बात करते हुए कहती है कि मोदीजी का ये फैसला 1969 में इंदिरा द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के जैसा ही है। केंद्र के पास सारी ताकत कई मायनों में 1970 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसलों की याद दिलाता है।

मोदी ने लोगों से 50 दिन मांगे थे, लेकिन 2 महीने हो गए हैं। हमें उनसे पूछना चाहिए कि खिर इस फैसले से हासिल क्या हुआ। कालाधन बाहर लाने की दुहाई दे रहे थे। लेकिन सिर्फ 6 से 10 प्रतिशत पैसा ही काले धन के रूप में सामने आया। दूसरी तरफ सारे बंद हुए नोट वापस सिस्टम में आ गए।

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