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बलिदान की कहानियां: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय मुस्लिम सैनिकों के अपने परिजनों को लिखे गए पत्र

“हम एक ऐसी दुकान में गए जहाँ लगभग 2000 लोग काम करते हैं और वहां से सबकुछ खरीदा जा सकता है,” प्रथम विश्व युद्घ के दौरान ब्राइटन में तैनात एक भारतीय मुस्लिम सैनिक ने लिखा। “यहाँ किसी भी चीज़ की कीमत पूछने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उस पर पहले से सबकुछ लिखा है।”

ए अली ने 1915 में अपनी लन्दन यात्रा के दौरान यह पत्र भारत में रह रहे अपने परिवार को लिखा था।

पत्र में उन्होंने एक भूमिगत ट्रेन में ज़मीन के नीचे यात्रा के “अजीब और अद्भुत अनुभव” और अंग्रेजी शहरों में पुलिसकर्मियों के निर्विवाद अधिकार के बारे में लिखा था।

“पुलिस वास्तव में प्रशंसा की पात्र हैं। अगर एक पुलिसकर्मी ने अपने हाथ उठा दिया तो उस दिशा में मौजूद हर एक व्यक्ति, अमीर और गरीब समान रूप से खड़ा हो जाता है, और तब तक खड़ा रहता है जब तक पुलिसकर्मी का हाथ उठा रहता है। बोलने की कोई जरूरत ही नहीं है।”

कई अन्य पत्रों के साथ इस पत्र का पता बर्मिंघम सिटी यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के लेक्चरर इस्लाम इस्सा ने लगाया था। यह पत्र मैनचेस्टर में ब्रिटिश मुस्लिम विरासत केंद्र में स्टोरीज़ ऑफ़ सैक्रिफाइस (बलिदान की कहानियां) नाम से लगी एक स्थायी प्रदर्शनी का हिस्सा बने हैं। इस प्रदर्शनी का उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध(1914-1918) में मुस्लिम सैनिकों की भूमिका पर रौशनी डालना है।

इस्सा द्वारा संरक्षित प्रदर्शनी की आधिकारिक वेबसाइट पर अपने प्रियजनों के लिए इन सैनिकों द्वारा भेजे गए पत्र के कुछ अनुवाद मौजूद हैं।

अभी तक, इस युद्ध में लड़ने वाले मुस्लिम सैनिकों की संख्या 4,00,000 के आसपास दर्ज थी। इस्सा के अनुसंधान के बाद अब यह आंकड़ा लगभग दोगुना होने का पता चला है, यह संख्या अब लगभग 8,85,000 हो गयी है।

इससे पहले इस साल, इस्सा को सैनिकों द्वारा अपने परिजनों को लिखे गए यह हजारों अनदेखे तब मिले जब वे स्टोरीज़ ऑफ़ सैक्रिफाइस प्रदर्शनी के लिए सही सामग्री की तलाश कर रहे थे। “अभिलेखीय अनुसंधान ने यह साबित किया कि अभी तक ऐसी बहुत सारी सामग्री मौजूद है जिसका दस्तावेजीकरण नहीं हुआ है,” इस्सा ने कहा। “मैंने जो आइटम देखे उनमें से कुछ के बारे में वास्तव में, इससे पहले कभी पता नहीं लगाया गया था, विशेष रूप से सेना के निजी संग्रह को, जो जनता के लिए देखना आसान नहीं है। तो मुझे लगता है कि अभी भी पता लगाने के लिए बहुत कुछ बाकी है।”

इस्सा ने संग्रह को “व्यक्तिगत और अद्वितीय” बताया।

इस्सा ने इन पत्रों को पढने में कई दिन बिताये। कुछ पत्रों से लिखने वालों के व्यक्तित्व में बेहतर अंदाज़ा लगाया जा सकता है तो कुछ सामान्य हैं, जिन पत्रों ने इस्सा को सबसे ज़्यादा आकर्षित किया वे थे उन सैनिकों के पत्र जिनमें जिन्होंने बेहद बारीकी से लन्दन वासियों जायज़ा लिया हुआ था और उन्हें लिखा हुआ था।

ऐसे ही एक पत्र में, एसएएस अब्दुल सईद नाम के एक सैनिक ने इंग्लैंड के साफ-सफाई के मानकों के बारे में अपने घर पत्र लिखा था। “इस देश में हर दुकान इतनी व्यवस्था की है कि उन्हें देख कर भी ख़ुशी मिलती है।।। हर दुकानदार विशेष रूप से कोशिश करता है उसकी दुकान पाकीज़ा रहे और सब कुछ सही क्रम में रहे। चाहे आप ज्यादा या बहुत कम खरीदें, वह ठीक से लपेटा जाता है, और यदि आप अपने घर पर इसे प्राप्त करना चाहते हैं तब आप केवल दुकानदार को अपना पता दें वह सामान आपके घर पहुंचवा देगा” उसने लिखा और साथ कहा कि उसे यहाँ की कसाई की दुकान भी बेहद पसंद आई। “हिंदुस्तान में कसाई की दुकानों बहुत गंदा रहती हैं,” उन्होंने लिखा था। “लेकिन यहाँ वे बेहद साफ सुथरा हैं और इसने बिल्कुल भी बू नहीं आती है।”

इस्सा इस्लाम स्टोरीज़ ऑफ़ सैक्रिफाइस प्रदर्शनी में

“मेरे लिए, मैं जिस बलिदान की खोज कर रहा था, वह विचारधारा या राजनीति के बारे में कम था क्योंकि ज़्यादातर सैनिकों को इस बारे में पता ही नहीं था कि वे किस लिए लड़ रहे हैं,” इस्सा ने बताया। “मैं बलिदान को एक सामान्य, मानव स्तर पर खोज रहा था जैसे उनके परिवारों को पीछे छोड़ कर एक दूर देश जाना। यह पत्र युद्ध के उस व्यक्तिगत पहलु को दर्शाते हैं जो सैनिकों के व्यक्तिगत बलिदानों से बना है”।

इस्सा जैसे जैसे इन पत्रों को पढ़ते गए, उन्हें मुस्लिम सैनिकों द्वारा प्रथम विश्व युद्ध में निभाई गयी अलग-अलग भूमिका के बारे में पता चला जैसे खाई बनाने वाले, ऊंट सवार, डॉक्टर।

प्रदर्शनी के अनुसार, लाखों की संख्या में प्रत्येक सप्ताह पत्र भेजे और प्राप्त किये गए थे और लगभग 3,75,000 पत्र सेंसरशिप की एक सावधान प्रक्रिया से भी गुज़रे। इन पत्रों के अक्षरों का अनुवाद कर मासिक रूप से विश्लेषण कर एक विस्तृत रिपोर्ट बनायी जाती थी जिसको उच्च अधिकारीयों को सौंपा जाता था। इन रिपोर्टों को, रेजीमेंट की जगह आस्था और जातीयता के आधार पर वर्गीकृत किया गया था जैसे पंजाबी मुस्लमान या सिख की तरह।

प्रदर्शनी कुछ भारतीय सैनिकों द्वारा अभ्यास की जाने वाली सेल्फ-सेंसरशिप की तरफ भी ध्यान आकर्षित करती है। सैनिक अपने परिवार को परेशानियों से बचाने के लिए युद्ध की जानकारी लिखने से बचते थे और रक्तपात की अधिक जानकारी लिखने से युद्ध को मिलने वाला समर्थन भी नर्म पड़ सकता था। वे कुछ कोड वर्ड इस्तेमाल करते थे जैसे भारतियों के लिए काली मिर्च, अंग्रेजों के लिए लाल मिर्च और युद्ध के लिए शादी।

प्रदर्शनी की वेबसाइट पर एक ऐसे ही पत्र की कहानी मौजूद है:

“मेरठ डिवीजन की सिग्नलिंग की का एक पठान सैनिक, शाहब खान, फ्रांस में सेवारत था तब उसने अपने भाई, 112वां इन्फैंट्री के अब्दुल्ला खान के लिए एक लंबा पत्र लिखा था। पत्र नामों से भरा था – पहले उसने एक गांव के झगड़े के बारे में लिखा, और फिर उसके बाद मुकदमेबाजी का वर्णन किया। लेकिन इस पत्र पर सेंसर को संदेह हो गया क्योंकि खान पत्र में बार बार दोहरा रहा था कि वह युद्ध के बारे में नहीं लिख सकता। इस पत्र को सेंसर ने ब्लाक कर दिया और उस पर टिपण्णी लिखी: ‘यह पत्र वास्तव में एक चालाक लेखन का नमूना है। सेंसर लिखता है कि इस पत्र में कोड नाम के पहले अक्षर में निहित है जैसे ‘जलाल खान’ का मतलब था ‘जर्मनी’, ‘अहमद दीन’ था ‘ऑस्ट्रिया’, ‘रहमत खान’ था ‘रूस’, ‘बरकत अली’ ‘बेल्जियम’ था, ‘सरवर खान’ था ‘सर्बिया’, इत्यादि। सेंसर ने निष्कर्ष निकला कि अगर इस व्यख्या के आधार पर पत्र को दुबारा पढ़ा जाए तो यह पत्र युद्ध की अब तक की पूरी कहानी कह रहा है।

प्रदर्शनी के लिए अधिकाँश अनुसंधान इस्सा ने ही पत्र, रेजिमेंट डायरी, रिपोर्ट पढ़ने, नक्शों और पुरस्कार सूचियों के अध्ययन बाद किया है। देखने वाली सामग्री में दुर्लभ तस्वीरें, नक्शे और अन्य कलाकृतियों शामिल हैं।

हालांकि, इस्सा के अनुसार, “युद्ध और इसके बलिदान की पुरानी यादें अब कम हो रही हैं, क्योंकि अब वैश्विक नागरिक के लिए युद्ध एक स्थायी जवाब नहीं है। एक ‘साझा दुश्मन’ की धारणा जैसे पहले हुआ करती थी अब नहीं है।”

इस्सा के अनुसार, अब अभिलेखीय सामग्री का संग्रह सोशल मीडिया पोस्टों, राजनीतिक भाषणों और मीडिया रिपोर्टों के रूप में होगा जो भविष्य के अनुसंधानकर्ताओं के अनुसंधानों का आधार बनेगा। “भविष्य की पीढ़ियों के लिए यह काफी दिलचस्प हो सकता है कैसे एकल घटनाओं को एक ही देश में होने के बावजूद दो बिलकुल विभिन्न तरीकों से रिपोर्ट किया गया है जैसे एक ही देश के दो अलग चैनल, अखबार की रिपोर्ट और नेताओं के भाषण।”

 

मूल लेख scroll.in पर प्रकाशित हुआ है। इसका हिंदी अनुवाद सियासत के लिए मुहम्मद ज़ाकिर रियाज़ ने किया है।

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