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बशारते ख़ुदावंदी पर कलमा-ए-शुक्र

ए मेरे परवरदिगार! क्योंकर होसकता है मेरे हाँ बच्चा? हालाँकि हाथ तक नहीं लगाया मुझे किसी इंसान ने। फ़रमाया बात यूंही है (जैसे तुम कहती हो लेकिन) अल्लाह पैदा फ़रमाता है जो चाहता है।

ए मेरे परवरदिगार! क्योंकर होसकता है मेरे हाँ बच्चा? हालाँकि हाथ तक नहीं लगाया मुझे किसी इंसान ने। फ़रमाया बात यूंही है (जैसे तुम कहती हो लेकिन) अल्लाह पैदा फ़रमाता है जो चाहता है।

जब फ़ैसला फ़रमाता है किसी काम (के करने) का तो बस इतना ही कहता है उसे कि हो जा तो वो फ़ौरन हो जाता है। (सूरा आल इमरान।४७)

हज़रत मर्यम अलैहिस्सलाम को जब एसे बच्चे की बशारत दी गई तो आप कुंवारी थीं, शिशदर(हैरत) होकर पूछने लगीं मेरे रब! मेरे हाँ बच्चा कैसे होगा, जबकि मुझे आज तक किसी इंसान ने हाथ तक नहीं लगाया। बाज़ ने लिखा है कि इस आयत से ये साबित नहीं होता कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की विलादत बाप के बगै़र हुई, क्यूंकि यहां तो सिर्फ़ पीशीनगोई की जा रही है कि तुम्हारा बच्चा होगा, यानी शादी के बाद। उनकी ख़िदमत में सिर्फ़ इतनी गुज़ारिश है कि अगर मक़सद यही था तो इस में ताज्जुब की कोई बात ना थी, लोग शादी किया करते हैं, बच्चे पैदा होते रहते हैं। ये तो मुनासिब था कि हज़रत मर्यम इस बशारत पर कलिमात शुक्र ज़बान पर ले आतीं, लेकिन आप का तसव्वुर हैरत-ओ-इस्तिजाब बन कर दरयाफ़त करने का कोई महल ना था।

और अगर ये कहा जाये कि हज़रत मर्यम ने सही बात नहीं समझी थी, उन्हें ये ग़लतफ़हमी हो गई थी कि शायद अभी बच्चा पैदा होने वाला है। हालाँकि अभी तो सिर्फ़ उसकी विलादत की इत्तेला दी जा रही थी, पैदा तो उसे शादी के बाद होना था। अगर इस बात को दरुस्त तस्लीम करलिया जाये तो फिर अल्लाह ताआला ने हज़रत मर्यम के इस्तिजाब का जो जवाब दिया वो मौज़ूनियत से आरी नज़र आता है।

सीधा जवाब ये था कि मर्यम घबराव‌ नहीं, जब तुम शादी करोगी बच्चा इस के बाद पैदा होगा। अगर अल्लाह ताआला किसी बात को सही सही बयान करने की क़ुदरत रखता है या अलफ़ाज़ और उस्लूब बयान का कोई वज़न होता है तो फिर ये तावील बल्कि तहरीफ़ लायक़ इलतिफ़ात नहीं।

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