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बांग्लादेश धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र नहीं बनेगा

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बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं की 28 साल पुरानी याचिका को हाई कोर्ट ने सोमवार को खारिज कर दिया। मालूम हो की उनलोगों ने इस्लाम को राजकीय धर्म की मान्यता देने वाले 1988 के संवैधानिक प्रावधान को चुनौती दी थी।जस्टिस नईमा हैदर, जस्टिस काजी रजा-उल हक और जस्टिस अशरफुल कमाल की पीठ ने यह आदेश पारित किया। इस पीठ के गठन का निर्देश सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार सिन्हा ने इस वर्ष 29 फरवरी को सुनवाई के दौरान दिया था। ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं को अर्जी दाखिल करने का अधिकार नहीं है।बांग्लादेश की संसद में सात जून, 1988 को आठवां संशोधन विधेयक पारित हुआ जिसमें इस्लाम को राजकीय धर्म का दर्जा दिया गया था। इसके तत्काल बाद प्रावधान को चुनौती देते हुए 15 नामचीन हस्तियों ने जनहित याचिका दाखिल की थी। उनमें से कई लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं।

याचिका पर पिछले साल एक अगस्त तक कोई सुनवाई नहीं हुई थी। उस समय सुप्रीम कोर्ट के एक हिंदू वकील समेंद्र नाथ गोस्वामी ने हाई कोर्ट में अर्जी दाखिल की इसमें सवाल उठाए थे कि 2011 के संविधान संशोधन में धर्मनिरपेक्षता को बांग्लादेश की राष्ट्रीय नीति के तहत पुनर्जीवित किए जाने के बावजूद इस्लाम को राजकीय धर्म की स्वीकृति कैसे जारी रह सकती है।गोस्वामी की याचिका को दो जजों की पीठ ने पिछले वर्ष सात सितंबर को ठुकरा दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं के आग्रह पर 29 फरवरी को फिर सुनवाई शुरू हुई, इसमें चीफ जस्टिस ने तीन सदस्यीय पीठ गठित की थी।

लगभग तीन दशक पुरानी याचिका पर सुनवाई के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू किए जाने के विरोध में बांग्लादेश की सबसे बड़ी पार्टी जमाते इस्लामी देशव्यापी हड़ताल भी कर चुकी है। बांग्लादेश में 90 फीसद से अधिक आबादी मुस्लिमों की है। अल्पसंख्यकों में हिंदू, ईसाई व बौद्ध शामिल हैं।आपको बता दू की बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट के दो भाग हैं। एक खंड को हाई कोर्ट डिवीजन तथा दूसरे को अपीलीय अभिकरण कहा जाता है।

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