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बाबरी मस्जिद की शहादत और बंद

शहादत बाबरी मस्जिद की बरसी के मौक़ा पर सारे शहर में मुस्लमानों ने बंद मनाया और इस बंद के दौरान बाअज़ गैर मुस्लिम भाईयों ने भी अपनी दुकानात होटलें पेट्रोल पंप्स बंद रखे जब कि सारे बैंक्स भी बंद रखे गए थे लेकिन अफ़सोस के उन लोगों के

शहादत बाबरी मस्जिद की बरसी के मौक़ा पर सारे शहर में मुस्लमानों ने बंद मनाया और इस बंद के दौरान बाअज़ गैर मुस्लिम भाईयों ने भी अपनी दुकानात होटलें पेट्रोल पंप्स बंद रखे जब कि सारे बैंक्स भी बंद रखे गए थे लेकिन अफ़सोस के उन लोगों के कारोबारी इदारे काम करते रहे जिन्हों ने अवाम को ललकारा था कि वो बाबरी मस्जिद की शहादत की बरसी के मौक़ा पर बंद मनाएं ।

ख़ुद को मुस्लमानों के क़ाइद कहलाने में फ़ख़र महसूस करते हैं लेकिन उन के क़ौल-ओ-फाअल में ज़बरदस्त तज़ाद पाया जाता है जब कि जिस जमात ने बाबरी मस्जिद की शहादत पर आँसू बहाने की कामयाब अदाकारी की इसी जमात के अहम क़ाइदीन और कारकुनों की होटलें , दुकानात और पेट्रोल पंप्स खुले रहे । हालाँकि शहर का एक गरीब रिक्शारां भी 6 दिसंबर को यौम ग़म मनाता है ये वो दिन है जब हिंदू दहश्तगर्दों और ग़द्दार-ए-वतन ने बाबरी मस्जिद शहीद कर दी थी । 6 दिसंबर 1992 से अब तक जब भी 6 दिसंबर का दिन आता है तो ऐसा लगता है कि हम ने उस दिन अपनी बहुत ही अज़ीज़ शय खोदी है ।

हमारा सब कुछ लुट चुका है । एक बुज़ुर्ग ने बहुत ही ग़मगीन अंदाज़ में कहा कि जिन लोगों ने अपनी होटलें दुकानात बैंक्स और पेट्रोल पंप खुले रखे हैं ऐसा लगता है कि उन्हें बाबरी मस्जिद की शहादत का कोई ग़म नहीं बस अपने मुफ़ादात की फ़िक्र लाहक़ है । हम ने मुख़्तलिफ़ इलाक़ों का दौरा किया । शाह अली बंडा में मुक़ामी जमात के एक अहम कारकुन का पेट्रोल पंप वाक़ै है, उस ने तिजारती फ़ायदे को मल्हूज़ रखते हुए पेट्रोल पंप को खुला रखा जब कि कुछ ही फ़ासले पर वाक़ै एक गैर मुस्लिम का पेट्रोल पंप बंद पड़ा था । इस पेट्रोल पंप के मालिक के बारे में कहा जाता है कि वो रुक्न पार्लियामेंट का करीबी आदमी है एक तरह से उन की नाक का बाल है ।

इसी तरह सरदार महल के करीब कोटला आलीजाह में स्टेट बैंक आफ़ इंडिया ने अपना ए टी एम बंद रखा जब कि अफ़सोस की बात ये है कि दारुस्सलाम आग़ा पूरा का ए टी एम खुला हुआ था । आजकल ऐसा लगता है कि मिल्लत से हमदर्दी और उस की क़ियादत का दावा करने वाले किरदार के नहीं बल्कि गुफ़तार के ग़ाज़ी बन गए हैं और बाबरी मस्जिद की शहादत और हर साल उस की बरसी के मौक़ा पर मगरमच्छ के आँसू बहाना उन लोगों की आदत सानिया बन चुकी है ।

पुराना शहर की मुख़्तलिफ़ बस्तियों में अवाम अब कह रहे हैं कि आख़िर ये लोग क़ियादत और मुस्लमानों की नुमाइंदगी के नाम पर हमें कब तक बेवक़ूफ़ बनाए रखेंगे? अब लोग बेवक़ूफ़ बनने वाले नहीं हैं उन्हें अच्छी तरह मालूम हो गया है कि हमदर्दी के नाम पर उन का किस तरह इस्तिहसाल किया जा रहा है । शहादत बाबरी मस्जिद की बरसी के मौक़ा पर दुकानात-ओ-तिजारती इदारे बंद करने की अपील करनेवाली इस जमात के कारकुनों ने पिछले दरवाज़ा से ग्राहकों की ख़िदमत करते हुए ये बता दिया कि वो अपने मुफ़ादात को अज़ीज़ रखते हैं, मिल्लत को नहीं काश!

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