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बाबरी विध्वंस का गुप्त गवाह: 1992 में कारसेवकों के बीच एक अंडरकवर पत्रकार

जब भी मैं अयोध्या के बारे में पढ़ता हूँ तब 1992 के वह भयावह अनुभव मुझे याद आ जाते हैं जो मैंने पवित्र शहर की पहली यात्रा के दौरान प्राप्त किये थे। भाजपा की दिल्ली इकाई के एक नेता से प्राप्त एक परिचय पत्र के साथ मैंने कारसेवकों के बीच अपना रास्ता बनाया था। शुरुवात में मुझ से बहुत पूछताछ की गयी। मुझे कई बार एक ही मनगढ़ंत कहानी दोहरानी पड़ी कि मैं एक कश्मीरी हिन्दू हूँ जिसने कश्मीर में चल रही आतंकी गतिविधियों से तंग आ कर अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। लेकिन बाद में मुझे एक “असली कारसेवक” के रूप में स्वीकार किये जाने के बाद, मैंने उस धार्मिक नाटक को साक्षात् देखा जिसे राजनीतिक गड़बड़ के पीछे छुपा कर रखा गया था।

किसी तरह मैंने विवादित स्थल के नज़दीक मौजूद एक टेंट में अपने लिए जगह बनायी। एक दिन तड़के सुबह (छ दिसम्बर से कुछ दिन पहले), मैंने देखा कि लगभग सौ से भी ज़्यादा लोग दो कब्रगाहों के पास इकठ्ठा थे। जल्द ही उन लोगों ने लोहे के सरियों, बड़े पत्थरों और नुकीले औजारों से कब्रों को तोड़ना शुरू कर दिया। मुझे भी उनके साथ शामिल होना पड़ा। लोग इसे छोटी कारसेवा कह रहे थे।

इसी तरह दूसरी कब्रों को भी तोड़ा गया। उस जगह को इकसार किया गया और पानी छिड़का गया जिससे लगे कि वहां कुछ हुआ ही नहीं है। कंकड़ पत्थरों को इकठ्ठा करके पास के एक तालाब में फेंक दिया गया। एक घंटे के भीतर वहां चाय की दो अस्थाई दुकानों को लगा दिया गया। यह सब भाजपा के एक पूर्व सांसद की मौजूदगी में हुआ।

बजरंग दल के कुछ सदस्य वहां एक छोटे से मंदिर का निर्माण करना चाहते थे। लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया। उन्हें कहा गया कि ऐसा करने से दूसरा विवाद उत्पन्न हो जायेगा और राम मंदिर के निर्माण कार्य में इससे दुविधा उत्पन्न हो सकती है।

पीएसी या प्रांतीय सशस्त्र बल और कारसेवकों के बीच बिलकुल वैसा सौहार्दपूर्ण रिश्ता था जैसे भाजपा और आरएसएस में है। मटमैले कपड़ों में अयोध्या में घूमते हुए मैं कई पीएसी के जवानों से मिला। मुझसे वे बड़े सम्मान के साथ मिले। एक रात मैंने और कुछ कारसेवकों ने लगभग चार घंटे तक पीएसी के जवानों के साथ बातचीत की। “हमारी चिंता मत करों, हम तुम्हारे पीछे चट्टान की तरह खड़े हैं, ” एक जवान ने कहा। “अगर हमें 6 दिसम्बर को तुम पर हमले का आदेश मिला तो हम हथियार छोड़ कर तुम्हारे साथ शामिल हो जायेंगे, ” दुसरे ने कहा। “हम पेरामिलिट्री सेनाओं को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर देंगे, ” तीसरे ने कहा।

पीएसी के इसी समूह से मुझे पता चला कि पीएसी के एक जवान को मस्जिद की ईंटे हटाते पकड़ा गया था। “वह 10-12 ईंट हटा चुका था जब उसे पकड़ा गया, ” एक जवान ने मुझे बताया। एक कांस्टेबल सीआरपीऍफ़ की कार्यवाई से बेहद नाराज़ था। कुछ दिन पहले सीआरपीऍफ़ के जवानों ने विवादित परिसर में खड़े एक कांस्टेबल को हटा दिया था। वह मामला बड़े अधिकारीयों के हस्तक्षेप से सुलझाया गया था, जवान ने बताया।

कारसेवकों और उत्तर प्रदेश पुलिसकर्मियों के बीच खुशमिजाजी स्पष्ट थी। वे हमारे लिए चाय खरीदते थे और बाद में उनमें से एक ने हमें उनके शिविर में नाश्ते के लिए भी आमंत्रित किया था।

ऐसे कई सारे कारसेवक थे हथियारों के साथ आये थे। एक लड़के ने मुझे फ्लिक चाकु दिखाया और चलाना भी सिखाया। साथ ही, कुछ साधुओं के पास वायरलेस सेट भी थे। एक साधू ने मुझे बताया कि वह विवादित स्थल के आसपास घूम रहे संदिग्ध लोगों पर नज़र रखता है। “हम उन पत्रकारों पर भी नज़र रख रहे हैं जो शान-ए-अवध होटल में ठहरे हुए हैं, ” उसने बताया।

एक व्यक्ति जो मेरे साथ रह रहा था उसने मुझे बताया कि यहाँ सारी व्यवस्था आरएसएस ने की है। “भोजन हो या टेंट, सबकी आरएसएस ने व्यवस्था की है”। वह मुझे एक बहुत बड़े भोजनालय पर ले गया। वहां खाना परोस रहे व्यक्ति ने बताया कि अब तक एक लाख लोग अयोध्या पहुँच चुके हैं। उसने बताया कि कुछ और रसोइयाँ बनायीं गयी हैं और हर स्तिथि से तैयार रहने के लिए गोदाम भर दिए गए हैं। मुझे भोजनालय ले जाने वाले व्यक्ति ने बताया, “हमने रणनीति तैयार कर ली है। उत्तर प्रदेश पुलिस हमारे साथ है और हमारी विजय निश्चित है”।

बयानबाजी के अलावा, मैं एक बहुत बेहतरीन संगठनात्मक मशीनरी का गवाह बना जो बेहद व्यवस्थित रूप से कारसेवकों की हर ज़रूरत को पूरा कर रही थी जैसे पहचान पत्र, भोजन के कूपन, टेंट, लाइट। हालाँकि यह मशीनरी सिर्फ भोजन और आवास सम्बंधित सेवा तक ही सीमित नहीं थी। बल्कि यह विध्वंस के लिए ज़रूरी औजारों का भी इंतज़ाम कर रहे थे। सभी को पता था कि वह दिन नज़दीक है।

 

(यह लेख 2010 में आउटलुक में प्रकशित हुआ था. इसके लेखक संजय कव हैं जो 1992 में स्टेट्समैनके लिए एक अंडरकवर पत्रकार के रूप में अयोध्या गए थे. इसका हिंदी अनुवाद सियासत के लिए मुहम्मद ज़ाकिर रियाज़ ने किया है. )

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