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बिहार में धूल चाटने के बाद, यूपी चुनाव में BJP की डगर आसान नहीं

उत्तर प्रदेश: बिहार असेंबली इलेक्शन में धूल चाटने के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए जाति और अस्मिता की राजनीति से फिर दो-दो हाथ करना है. लेकिन यूपी में भी बीजेपी का डगर आसान नहीं है.
बीजेपी को लग रहा है कि लाइन ऑफ कंट्रोल के पार सेना के हालिया सर्जिकल हमलों के बाद राष्ट्रवाद के मुद्दे और तीन तलाक के मद्दे को उभार उसे यूपी में फायदा मिलेगा. बिहार चुनाव के दौरान आरक्षण के बारे में आरएसएस प्रमुख के बयान ने बीजेपी को मुश्किल में डाल दिया था. बीजेपी के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘बिहार चुनाव में सामाजिक न्याय की बहस हावी हो गई थी. विकास और कानून-व्यवस्था के हमारे मुद्दे पीछे छूट गए थे.

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नव भारत टाइम्स के अनुसार, बीजेपी यूपी में दो अन्य सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों पर दांव लगा रही है, इनमें पहली यह है कि यूपी में कथित सवर्णों की संख्या अधिक है, और दूसरी 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार के मुकाबले यूपी में ज्यादा शहरीकरण. बीजेपी को लगता है कि इन चीज़ों का लाभ उस को मिलेगा, अब तो यह समय ही बताएगा कि बीजेपी को कितना लाभ मिल पायेगा.
आप को बता दें कि BJP के नेता सुब्रमण्यम स्वामी कह चुके हैं कि चुनाव जीतने के लिए विकास का मुद्दा ही काफी नहीं धार्मिक और जातिवाद का मुद्ददा भी अहम् है. इस लिए इस बात की पूरी संभावना है कि UP चुनाव में BJP द्वारा धार्मिक और जातिवाद का मुद्दा उभारा जा सकता है.

जहां तक सामाजिक संरचना की बात है तो बीजेपी को लग रहा है कि बिहार के मुकाबले यूपी में वह बेहतर स्थिति में है क्योंकि यहां अपर कास्ट पॉप्युलेशन का अनुपात ज्यादा है. बीजेपी के नेताओं का आकलन है कि अपर कास्ट पॉप्युलेशन (पार्टी समर्थक ट्रेडर कम्युनिटी सहित) लगभग 25% होगी. बीजेपी का मानना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सेक्शन ने उसकी काफी मदद की थी.

बीजेपी के एक अन्य इलेक्शन मैनेजर ने कहा, ‘मायावती अब ब्राह्मणों के बजाय मुसलमानों को खींचने पर ज्यादा जोर देती दिख रही हैं. वहीं अपर कास्ट के लोगों में एसपी या बीएसपी की अपील काफी कम है.

बीजेपी नेता यूपी में अगड़ी जातियों को लुभाने का भरपूर पर्यास कर रही है. वहीँ बिहार में एनडीए को भूमिहारों और अगड़ी जातियों की अच्छी आबादी वाले बेगूसराय में एक भी सीट नहीं मिली थी. मिथिला क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में ब्राह्मणों ने नीतीश को वोट दिया था. इसके अलावा बीजेपी लोध, कुशवाहा, कुर्मी और जाट सहित विभिन्न समुदायों के लोकल नेताओं को आगे कर रही है ताकि अगड़ी जातियों में अपने आधार में इन समुदायों के वोट जोड़े जा सकें. अब यह तो समय ही बताएगा कि यूपी में ऊंट किस करवट बैठता है.

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