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बिहार, शराब और हकीकत

अब्दुल हमीद अंसारी

बिहार में जहां बिजली, पानी, सड़क जैसी बड़ी से बड़ी मसायल है, शराब वहां बहुत आसानी से मिल जाता है।
बिहार के गांव में शराब किसी भी चौक-चौराहा, छोटे से छोटे नुक्कड़ पर भी बेहद आसानी से मिल जाते हैं, बाजार के कई पान दुकान पर भी शराब की बिक्री खूब होती है। बिहार के ज्यादातर गरीब जो शराब पीते हैं, रोज़मर्रा की चीजों में शामिल कर रखा है। मतलब बिहार में शराब मिल जाना बेहद आसान है।

बिहार हुकुमत‌ ने फैसला किया है कि 1 अप्रैल से शराब पर पाबंदी लगा दी जायेगी। ये फैसला बिहार के वज़ीर ए आला का एक रैली में किसी खातून को किये गये वादे को पूरा करने का फैसला है।

अगर आप समझने की कोशिश करेंगे तो आपको बता दूं, बिहार में शराब ने औरतों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। गरीब लोग सबसे ज्यादा शराब पीने में शामिल है, देशी शराब ने तो गरीबों को अपने ज़‌द में ले रखा है। कुछ लोग शराब से सोते हैं और  अपनी सुबह को भी शराब से ही शुरू करते हैं।

बिहार में ज्यादातर गरीब कर्ज में डूबे होते हैं, उनके कमाई का ज्यादा हिस्सा सूद‌ और शराब में चला जाता है, इसलिए उनके बच्चों और बीवी को माली मुशकिलों का सामना करना पड़ता है। बच्चों की सही परवरिश और तालीम हासिल कराने में नाकाम हो जाते हैं लोग, बिमारी की हालत में इनको कर्ज का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।

एक गरीब जो शराब का आदी हैं, तकरीबन 60 रूपये रोज खर्च कर देते हैं शराब पीने के लिए। बिहार के ज़्यादातर गरीबों का यही हाल है। शराब पर पाबंदी से गरीबों की माली हालत ठीक होंगे, उनके बच्चों की परवरिश और तालीम भी बेहतर तरीके से होने लगेंगे।

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