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बेकारी……. ……शौकत थानवी

बेकारी यानी बेरोज़गारी इस एतबार से तो निहायत लाजवाब चीज़ है कि हर छोटी से छोटी हैसियत का इंसान अपने घर में तमाम दुनिया से बेनयाज़ हो कर इस तरह रहता है कि एक शहनशाहे हफ़त अक़लीम(सारी दुनिया) को अपने महल में वो फ़ारिगुलबाली नसीब नहीं हो सकत

बेकारी यानी बेरोज़गारी इस एतबार से तो निहायत लाजवाब चीज़ है कि हर छोटी से छोटी हैसियत का इंसान अपने घर में तमाम दुनिया से बेनयाज़ हो कर इस तरह रहता है कि एक शहनशाहे हफ़त अक़लीम(सारी दुनिया) को अपने महल में वो फ़ारिगुलबाली नसीब नहीं हो सकती। सच तो ये है कि वो दौलत जिस को तमाम दुनिया के सरमायादार अपनी जान और अपना ईमान समझते हैं, एक ऐसा मुस्तक़िल अज़ाब है जो इंसान को कभी मुतमइन नहीं होने देता। सरमायादारों की तमाम ज़िंदगी बस यही फ़िक्र में कटती है एक ये कि अगर हमारा रुपया चोर ले गए तो क्या होगा?

यह फिक्र अपनी जगह ऐसी मोहलिक होती हैं कि उन को भी दिक़ की मिनजुमला इक़साम के समझना चाहिए बल्कि दिक़ की दूसरी किस्में तो मामूली हैं मसलन फेफड़े की दिक़, आंतों की दिक़, हड्डी की दिक़ वग़ैरा, मगर ये फ़िक्रें तो दिल और दिमाग़ की दिक़ से कम नहीं जिन का मारा हुआ न मरता है न जीता है। बस तोंद बढ़ती जाती है और दिल छोटा होता रहता है। मुख़्तसर ये कि इन सरमायादारों की ज़िंदगी हक़ीक़ी कश्मकश जबर-ओ-इख़तियार में बसर होती है कि न ज़िंदा रहते बन पड़ती है न मरने को दिल चाहता है, अब रहे ग़रीब उनकी ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है कि बिला ज़रूरत पैदा होगए और जब भी चाहा मर गए, न जीने की ख़ुशी थी न मरने का कोई गम
अपनी ख़ुशी ना आए न अपनी ख़ुशी चले

मतलब कहने का ये है कि चाहे हम को बेरोज़गारों की जमात गालियां दे या सरमायादारों का तबक़ा इनाम, लेकिन हम ये कहे बगै़र नहीं रह सकते कि मौजूदा दुनिया के लिए बेकारी एक रहमत है, हालाँकि उस रहमत से हिंदुस्तान के इलावा तमाम दुनिया के ममालिक चीख़ उठे हैं और हर तरफ़ से “हाय पेट हाय पेट” की सदाएं बुलंद हो रही हैं लेकिन हम सच कहते हैं कि “हाय पेट” की सदाएं “पेट फटा” की सदाऐं के मुक़ाबले में फिर भी काबुल-ए-बर्दाश्त हैं, लोग कहेंगे कि अजीब उल्टी समझ का आदमी है कि तर लुक़्मे पर फ़ाक़े को तर्जीह देता है, लेकिन जनाब हम इस हक़ीक़त से आशना हो चुके हैं कि फ़ाक़ा उसी वक़्त तक फ़ाक़ा है, जब तक तर लुक़्मे की उम्मीद इंसान के पेट को जहन्नुम और मादे को रबड़ का बनाए हुए है, लेकिन अगर इंसान तर लुक़्मे से ख़ाली उज़-ज़हन हो जाये तो यही फ़ाक़ा उस के लिए सब कुछ हो सकता है। मिर्ज़ा ग़ालिब मरहूम ने भी अपने एक शेर में इसी किस्म की एक बात कही है, जिस का तर्जुमा हमारे अलफ़ाज़ में ये हुआ कि……..
फ़ाक़े का ख़ूगर हुआ इंसां तो मिट जाती है भूख
इस क़दर फ़ाक़े पड़े हम पर कि लुक़मा बन गए

हम जो बात कहना चाह रहे हैं वो मामूली समझ के इंसानों के लिए बेकार है लिहाज़ा इस का कहना भी फ़ुज़ूल सी बात है वर्ना इस वक़्त हम इस किस्म की बुलंद बातें करना चाहते हैं, हम तो इस वक़्त बेकारी के मुताल्लिक़ कुछ कहना चाहते हैं जिस के ख़िलाफ़ सारी दुनिया में एहतिजाज का एक शोर मचा हुआ है। बेकारी अच्छी चीज़ है या बुरी इस के मुताल्लिक़ हम अपने ज़ाती ख़्याल को तफ़सील के साथ पेश करें तो हम को अंदेशा है कि या तो हमारी जान ख़तरे में पड़ जाएगी वर्ना ये तमाम दुनिया की तिजारत, कारोबार और मुलाज़िमतें वग़ैरा सब मफ़लूज हो कर रह जाएंगी। लिहाज़ा दोनों सूरतें ऐसी हैं कि ज़रा डर मालूम होता है मालूम नहीं कि ऊंट किस करवट बैठे, इसलिए बेहतरीन सूरत यही है कि आम नुक़्ता-ए-नज़र से हम भी बेकारी को बुरा फ़र्ज़ करने के बाद अपने ख़ामा से “चल बिसमिल्लाह” कहें।

बात असल में ये है कि नई और पुरानी दुनिया को मिलाकर जो कुर्राह-ए-अर्ज़ बनता है, इसमें तीन चौथाई तो बहर-ए-अलकाहल, बहरे अलग़ाफ़ुल , बहरे अलजाहल वग़ैरा की किस्म के बड़े बड़े समुंद्र हैं यानी पानी ही पानी। अब रह गई एक चौथाई दुनिया जो ख़ुदा नज़र-ए-बद से बचाए ख़ुशकी है। इस चौथाई दुनिया में लक-ओ-दक़ सहरा, सर बफ़लक पहाड़, रेगिस्तान जिन को इंसान से कोई ताल्लुक़ नहीं बस शुत्रस्तान कहना चाहिए और झीलें दरिया नाले वग़ैरा हैं। बाक़ी जो बची थोड़ी बहुत ख़ुशकी इस में खेत और बाग़ वग़ैरा से बची हुई ख़ुशकी को गावं, तहसील, परगना, शहर, ज़िला, सूबा, मुल्क और बर्रे आज़म वग़ैरा में तक़सीम कर दिया गया है और ये है वो मुख़्तसर सी गुंजाइश जिस में अशरफ़-उल-मख़लूक़ात मा चरिन्दों परिन्दों और दरिंदों के रहते हैं। इस महिदूद गुंजाइश में आबादी का ये हाल है कि ख़ुदा की पनाह रोज़ रोज़ बढ़ती जाती है। दुनिया की वुसअतें महिदूद हैं और नसल इंसानी की तरक़्क़ी ग़ैर महिदूद, अब जो लोग बेकारी का रोना रोते हैं तो आप ही बताईए कि दुनिया का क़सूर है या दुनिया में बसने वालों का, हाँ अगर निज़ाम-ए-फ़ित्रत होता कि हर इंसान के साथ एक आध बीघा ज़मीन भी पैदा हुआ करती तो वाक़ई बेकारी के मुताल्लिक़ हमारी तमाम शिकायतें हक़बजानिब थीं मगर अब तो हर नया पैदा होने वाला इस छोटी से दुनिया में गुंजाइश हासिल करना चाहता है जो बावा आदम से लेकर अब तक यानी अज़ आदम या ईं दम एक इंच भी नहीं बढ़ी, आप कहेंगे वाह बढ़ी क्यों नहीं, ये जो कोलंबस ने अमरीका का पता लगा कर इस दुनिया में एक और इज़ाफ़ा किया वो किधर गया तो इस का जवाब ये है कि वो पहले ही मौजूद था जब तक इंसान की जुस्तजू में कामयाब होने की सलाहियत पैदा ना हुई वो पोशीदा रहा और जब उस को ढ़ूंडा गया तो वो मिल गया। लेकिन अब ये उम्मीद रखना कि कोई और अमरीका मिल जाएगा ग़लत है इस लिए कि अब इंसान को बेकारी के ग़म ने या तो इस क़दर पस्तहिम्मत कर दिया है कि वो अपने गर्द-ओ-पेश पर नज़र डालने में भी काहिली से काम लेता है या सरमायादारी ने ऐसा दिमाग़ ख़राब कर दिया है कि मिर्रीख़ पर हुकूमत करने की फ़िक्र है। मुम्किन है कि कभी ये हवा में क़िला बनाने की जद्द-ओ-जहद में कामयाब हो जाये लेकिन अभी तो हम दुनिया से जा कर मिर्रीख़ में आबाद होने के लिए तैयार नहीं।

लाहौल-ओ-ला क़ोৃ कहाँ से कहाँ पहुंचे। हाँ तो हम ये कह रहे थे कि इंसान की कसरत ने दुनिया में बेकारी की वबा फैला दी है, बात ये है कि बूढ़े तो मरने का नाम नहीं लेते और बच्चे पैदा होना बंद नहीं होते। नतीजा ये होता है कि आबादी बढ़ती जाती है। अब ये देखिए कि जहां पाँच बच्चे तालीम हासिल करते थे वहां अब पाँच हज़ार तालीम हासिल करते हैं। पहले तो ये था कि ये पाँच बच्चे पढ़ने के बाद मुख़्तलिफ़ जगहों पर मुलाज़िम हो जाते थे, मुलाज़मत करते थे, पेंशन लेते थे और मर जाते थे। लेकिन उनके उम्मीदवार बजाय पाँच के पाँच हज़ार हैं, इस का लाज़िमी नतीजा ये है कि पाँच तो बदस्तूर बरसरेकार(कामदार) हो जाऐंगे , अब रहे चार हज़ार नौ सौ पचानवे वो यक़ीनी तौर पर बेकार रहेंगे। ग़लती दरअसल हिसाब की है कि अब आमद-ओ-ख़र्च बराबर नहीं रहा। पहले ये होता था कि उधर पाँच बच्चे पैदा हुए तो उधर पाँच बूढ़े मर गए, उधर पाँच मुलाज़िम हुए तो उधर पाँच मुलाज़िमों ने पेंशन ले ली, लेकिन अब बुड्ढों ने मरना तर्क कर दिया है और बच्चे बराबर पैदा होते चले जा रहे हैं। इस सूरत में कोई बड़े से बड़ा रियाज़ी दान हम को बताए कि हिसाबफ़हमी का आख़िर क्या तरीक़ा इख़तियार किया जाये।

अब ये देखिए कि पाँच हज़ार में से पाँच के बरसर-ए रोज़गार होजाने के बाद जो बाक़ी बचे थे चार हज़ार नौ सौ पचानवे, वो गोया सब के सब बेकार हुए इन बेचारों का ये हाल है कि ख़ुदा दुश्मन का भी ना करे, हाय वो तालिब इलमी की उम्मीदें कि बस पास हुए और डिप्टी कलक्टरी अपने घर की लौंडी है। फ़ारिगुत्तहसील हुए और ऑनरेबल बने, अगर गवर्नर नहीं तो उन के कौंसिलर तो ज़रूर ही हो जाऐंगे लेकिन जब पढ़ने के बाद दरख़ास्तें भेजना शुरू कीं तो हर जगह से नामंज़ूर हो कर वापिस डाकघर आगईं, अब बताईए कि उस वक़्त वो बेचारे क्या करें, तो घबरा कर क़ानून का मुताला शुरू करदेता है कोई तिजारत की तरफ़ रुजू होता है , कोई डिप्टी कलक्टरी से नाउम्मीद हो कर रेलवे में टिकट कलक्टरी कर लेता है, कोई बजाय ऑनरेबल होने के कलरीकल लाईन में निकल जाता है और ज़्यादा तादाद उन लोगों की होती है जो बस इरादा करते हैं और बदलते हैं , तजावीज़ पर ग़ौर करते और रह जाते हैं स्कीमों बनाते हैं और रद्द करते हैं यानी घर बैठे हुए बच्चों को खिलाते हैं और मज़े करते हैं उन लोगों को आम तौर पर बेकार बेरोज़गार कहा जाता है और आजकल दुनिया इन ही लोगों से भरी हुई है।

नसीहत करने वाले जो इत्तिफ़ाक़ से बेरोज़गारी के आलाम-ओ-मसाइब से क़तअन ना आशना होते हैं हमेशा यही कहा करते हैं कि आजकल के नौजवानों में आराम तलबी ऐसी आगई है कि हाथ पावं हिलाने को दिल ही नहीं चाहता। बस वो तो ये चाहते हैं कि घर पर पड़े हुए चारपाई के बाण तोड़ा करें और रुपय की बारिश हुआ करे उन नासा बुज़ुर्गों से कौन कहे कि जनाब-ए-वाला ये सब कुछ सिर्फ़ इस लिए है कि आप का साया हम कमबख़्तों के सर पर हनूज़ क़ायम है हालांकि आजकल उम्रे तिब्बी पचास पचपन साल है यानी पचपन साल की पेंशन पाते ही इंसान को मर जाना चाहिए। यानी ये ज़बरदस्ती तो मुलाहिज़ा फ़रमाईए कि दुहरी दुहरी उम्रे तिब्बी पाने वाले बुज़ुर्ग मरना तो भूल जाते हैं बस ये याद रह जाता है कि अपनी नाज़िल की हुई मुसीबतों पर बेकार नौजवानों को दिन रात लानत मलामत क्या करें, हालाँकि क़सूर सब इन ही का है , यही नौजवान जब बच्चे थे तो इन ही क़ब्रिस्तान का रास्ता भूल जाने वाले बुज़ुर्गों ने इन बेचारों को पढ़ाना शुरू किया था और तमाम ज़िंदगी ज़बरदस्ती पढ़ाते रहे यहां तक कि पढ़ाने वाले तो क़ब्र में पाउं लटका कर बैठ गए और पढ़ने वाले एक आध दर्जन बच्चों के बाप बिन गए अब उन से कहा जाता है कि अपने बच्चों और बाप दादा सब का पेट पालो तो बेचारे कहाँ से पालें, आरामतलब बना देने वाले आराम तलबी का ताना देते हुए किस क़दर अच्छे मालूम होते हैं बेकार कर देने वाले बेकारी पर लानत मलामत करते हुए कैसे भले लगते हैं, इन नासिहों से कोई पूछे कि अगर आप को अपनी औलाद के बाकार होने की फ़िक्र थी तो आप ने उस को दर्ज़ी क्यों न बनाया, बढ़ई क्यों न बनाया, लोहार क्यों न होने दिया, जूता बनाना क्यों न सिखाया और तालीम शुरू कराने से क़बल गला घूँट कर क्यों ना मार डाला , पहले तो तमाम ज़िंदगी बे कार ज़ाए की , स्कूल और कॉलिज की लॉट साहिबा ना ज़िंदगी बसर कराई, सूट, बूट का आदी बनाया और इस मुग़ालते में मुबतला रखा कि आने वाला दौर मौजूदा दौर से ज़्यादा ज़रीन और ख़ुशगवार है तो अब ये शिकवा क्या मानी रखती हैं और तमाम दुनिया का तो ख़ैर जो कुछ भी हाल हो लेकिन हिंदुस्तान जन्नतनिशॉँ का ये हाल है कि यहां बेकारी के सब इस तरह आदी हो गए हैं कि गोया हिंदुस्तानी इंसान का मकसद-ए-हयात यही बेकारी है जिसमें सब मुबतला हैं, हिंदुस्तान ऐसे जाहिल मुलक के पढ़े लिखे भी दो कोड़ी के और जाहिल भी दो कोड़ी के बल्कि जो बेचारे पैदाइशी यानी ख़ानदानी जाहिल हैं उन की हालत पढ़े लिखूं से बदरजहा बेहतर है , इस लिए कि वो मेहनत मज़दूरी कर के अपना और अपने मुताल्लिक़ीन का पेट पाल लेते हैं और पढ़े लिखूं का पेट उन के मुताल्लिक़ीन भरते हैं। उस वक़्त बेकारी का आलम ये है कि हिंदूस्तान के किसी शहर में देख लीजीए , बहुत से मुहल्ले के मुहल्ले ऐसे निकलेंगे जहां आप की दुआ से सब ख़ुदमुख़तार यानी आज़ाद होंगे, कोई किसी का नौकर चाकर नहीं, अब सवाल ये पैदा होता है कि वो फिर खाते कहाँ से हैं इस का जवाब ये है कि आप भी दुनिया के तमाम काम छोड़कर हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहें और देखिए कि ख़ुदा खाने को देता है या नहीं? पहले आप जायदाद पर हाथ साफ़ करेंगे फिर बीवी के ज़ेवर की बारी आएगी फिर कपड़ों और बर्तनों पर नौबत पहुंचेगी, मुख़्तसर ये कि ख़ुदा बाप दादा की कमाई हुई दौलत और जमा की हुई घरसती को रखे , बीवी के लाए हुए ज़ेवर को रखे और इन सब को कोड़ीयों के मूल ख़रीदने वाले महाजनों को रखे , बहरहाल आप इंशाअल्लाह अच्छे से अच्छा खाएंगे और जिस क़दर अच्छी ज़िंदगी आप की गुज़रे की वो तो उन नौकर चाकर किस्म के बरसर-ए कार लोगों ने ख़ाब में भी नहीं देखी।
मतलब कहने का ये है कि जिस बेकारी से एक दुनिया चीख़ उठती है इस से हिंदूस्तान क्यों घबराता है , हिंदूस्तान तो बाक़ौल हमारे ख़ुदावंद एन-ए-नेअमत के एक जाहिल, वहशी, ग़ैर मुहज़्ज़ब और काले आदमियों का मुल्क है , यहां अगर बेकारी है तो क्या ताज्जुब, जब यूरोप ऐसे मुतमद्दिम, तालीम-ए-याफ़ता, मुहज़्ज़ब और गोरे आदमियों के मुल्क में ये हाल है कि बेचारे साहिब लोग हर तरह नाकाम साबित हो कर वहां के हर शोबा -ए मुलाज़िमत से अलैहदा कर दिए गए हैं और उनकी जगह मेम साहबात बिराज रही हैं अगर ख़ुदा-ना-ख़ासता हिंदुस्तान में भी यही सूरत होजाती कि” इंदौर वन ख़ाना” एक दम से “बैरून ख़ाना” और “बैरून ख़ाना” एक दम से “अंदरून ख़ाना” हो कर रह जाते तो शायद यहां के लोग हिंदुस्तान को हवा की बेटियों के लिए छोड़कर या तो किसी और दुनिया में चले जाते जहां इबन-ए-आदम की हुकूमत हो या ख़ुदकुशी कर लेते, इसलिए कि ये इन्क़िलाब हिंदूस्तान के मर्दों के लिए नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है कि उन की बीवीयां तो कचहरी अदालत करें और वो ख़ुद घरदारी करें, बच्चों को खिलाईं, यानी मर्द पैदा हो कर औरत के फ़राइज़ अंजाम दें तो जनाब मतलब कहने का ये है कि यूरोप की बेकारी फिर भी काबिल-ए-बर्दाश्त है कि वहां के मर्द तो बेकार औरतें बाकार होगई हैं। एक दर बंद हुआ तो दूसरा खुल भी गया और हमारे हिंदुस्तान शरीफ़ के दोनों दर इस तरह बंद हुए हैं कि गोया कुंजी ही खींची गई, लिहाज़ा अब कभी खुला की उम्मीद नहीं ऐसी सूरत में अगर हिंदुस्तान के लोग ये समझते हैं कि बेकारी हमारा मकसद-ए-हयात है तो बताईए क्या ग़लत समझते हैं? क्या आप का मतलब है कि बेकार जद्द-ओ-जहद कर के अपनी जान दे दें या बेमानी कोशिशों के पीछे मर जाएं आख़िर क्या करें? इस बेकारी का जो ईलाज है वो हिंदुस्तानियों से उम्र भर नहीं होसकता और अगर होसकता है तो कर देखें, हम जभी जानें कि यूरोप के मर्दों की सी ग़ैरत और हमीयत पैदा कर के दिखाएंगे और अपने आप को औरतों के रहम-ओ-करम पर छोड़ दें। जब ये मालूम है कि मौजूदा दौर “दौर अलनिसा” है तो फिर बेकारी दूर करने की जद्द-ओ-जहद करना फ़ित्रत से जंग करना है या नहीं?

कैसी बेकारी .. हम तो ये जानते हैं कि जिस क़दर बेकारी से इंसान कसीरुल मशाग़ल हो जाता है, बाकारी में क़तअन नहीं होसकता। बेकारी ख़ुद एक ऐसा मशग़ला है कि इंसान को इस से कभी फ़ुर्सत नहीं मिलती। यक़ीन ना आता हो तो किसी बेकार इंसान का एक हफ़्ता का प्रोग्राम देख लीजीए और फिर अंदाज़ा कीजीए कि क्या इतना काम आप ज़िंदगी भर भी कर सकते हैं यक़नया आप को आप की दुगुनी उम्र भी मिलती तो शायद आप इस हफ़्ता का मुक़ाबला नहीं कर सकते थे। मसला एक शख़्स बेकार है और उसको किसी मशग़ले की फ़िक्र है वो सब से पहले डिप्टी कलेक्टर से लेकर वर्क सिनेटरी तक के लिए कोशिश करता है कि किसी तरह मुलाज़िमत मिल जाये और —

— इसी के साथ-साथ इरादा है कि आटा पीसने की चक्की लगा कर क़िसमत आज़माई करेगा और इस सिलसिले का तमाम हिसाब किताब मुरत्तिब होचुका है लेकिन एक ख़्याल ये भी है कि अगर हैदराबाद में कोई मुलाज़िमत मिल गई तो उसको तर्जीह दी जाएगी, एक तरह ये भी दिल चाहता है कि अगर सस्ती मिल जाये तो एक लारी ख़रीद ली जाये, बड़े नफ़ा की चीज़ है लोगों ने एक लारी ख़रीद कर इतना नफ़ा कमाया है कि थोड़े ही दिनों में उन के पास दस दस लारियां हो गई हैं और लखपति बन गए हैं, लेकिन अगर रेलवे स्टेशन पर किताबों के फ़रोख़त करने की इजाज़त मिल जाये तो क्या कहना है दुगुना और चौगुना फ़ायदा है और ये हड्डी का कारोबार भी बड़े नफ़ा की चीज़ है बस इंसान मुस्तक़िल मिज़ाज और मेहनती हो, फिर रुपये की कोई कमी नहीं और इन सब से अच्छा तो ये है कि एक माहवार अदबी रिसाला निकाल लिया जाये और अगर ख़ुदा तौफ़ीक़ दे तो रोज़ाना अख़बार से तो बेहतर कोई बात ही नहीं, मुख़्तसर ये कि उनके जितने इरादे होते हैं सब अपनी अपनी जगह मुस्तक़िल और उसका ज़हन हर जगह काम करता है। ये ख़्याली इस्कीमें जब अमल में आजाती हैं उस वक़्त कुछ न पूछिए कि क्या हाल होता है। वही बेकार इंसान बह यक वक़्त डिप्टी कलेक्टर से लेकर तमाम उन ओहदों पर जिनके नाम उसको याद हैं मुलाज़िम होगा कि अनक़रीब कोई “यार जंग” होने की भी उम्मीद होगी। लारी बल्कि लारियों का मालिक होगा, रेलवे स्टेशन की ठेकेदारी का शरफ़ भी हासिल होगा। एक अदबी रिसाले का मुदीर और एक रोज़नामे का चीफ़ ऐडीटर भी होगा। मुख़्तसर ये कि जहां-जहां उसके दिमाग़ की रसाई हुई होगी बस वो अपने नज़दीक वहां थोड़ी देर के लिए आलम-ए-तख़य्युल में ही सही बहरहाल कामयाब ज़रूर होगया होगा और इस फ़रेबे ख़्याल ने उस बेचारे की हालत इस कुत्ते की सी बना दी होगी जो शीश महल में हर तरफ़ अपनी ही सूरत देख कर बावला हो जाने के क़रीब हो, ये कैफ़ीयत उस क़दर आम है कि कम या ज़्यादा दुनिया के हर बेरोज़गार मगर तालीम याफ़ता बेरोज़गार में फ़र्क़ मौजूद है अब फ़र्क़ ये है कि जो समझदार हैं यानी जिन पर बेकारी का हल्का सा हमला हुआ है, या जिन्होंने इस हमले का कामयाब मुक़ाबला किया है वो तो ख़ैर इस किस्म की तमाम तजावीज़ अपने ज़हन में रखेंगे और उनके यहां तमाम सलाह मश्वरे बस दिल और दिमाग़ के दरमियान होंगे यानी उन की इस्कीमें अव्वल तो किसी को मालूम नहीं होंगी और मालूम भी होंगी तो मख़सूस लोगों को लेकिन वो लोग जो फितरतन कमज़ोर वाक़े हुए हैं या जिनको बेकारी ने हर एतबार से ज़ईफ़ बना दिया है इस मुआमले में इसी तरह के इंसान साबित होंगे जिनका हम ज़िक्र कर चुके हैं यानी उन के पास जाईए तो अस्सलामु अलैकुम-व-अलैकुम अस्सलाम के बाद जो उस मख़सूस मबहस पर गुफ़्तगु शुरू होगी तो उस वक़्त तक सिलसिला जारी रहेगा , जब तक आप ख़ुद “इजाज़त है?” न कहें और फिर इस गुफ़्तगु में जिस बेसाख़तगी के साथ मुतकल्लिम महव और बेखुद हो जाता है इस का ताल्लुक़ बस देखने से है, उस वक़्त अगर आप ने उस बेचारे की गुफ़्तगु तवज्जे के साथ सुन ली तो आप का ये एहसान वो उम्र भर नहीं भूल सकता, बल्कि आप को महसूस होगा कि वाक़ई ये बेचारा सिर्फ़ मेरी वजह से अब तक ज़िंदा है वर्ना नहीं मालूम कब का इस ख़ुदग़रज़ दुनिया को छोड़ चुका होता। आप की सूरत देखते ही वो फ़ौरन आप की तरफ़ बढ़ेगा कि “अस्सलामु अलैकुम । भाई ईद का चांद होगए, कहो तबीयत कैसी है और भावज का क्या हाल है ” और अगर इस के जवाब में कहीं आप ने उस का हाल भी पूछ लिया कि “ख़ुदा का शुक्र है भाई अच्छा हूँ , घर में भी ख़ैरीयत है तुम अपनी कहो कि उस दरख़ास्त का क्या हुआ?” बस उसी क़दर काफ़ी है गोया आप ने इजाज़त दे दी कि हाँ सुनाओ, दास्तान-ए-अमीर हमज़ा। बस उस ने कहना शुरू किया —

– “तुम को नहीं मालूम हुआ , लाहौल-वला कुव्वता , अम्मां ! इस ने तो बहुत तूल खींचा, हुआ ये कि डिप्टी कमिशनर साहिब के पास भेज दिया और कमिशनर साहिब ने लिख दिया कि जो चाहो करो हम नहीं जानते अब डिप्टी साहिब की फूंक निकल गई कि कहीं कमिशनर साहिब ने ग़ुस्सा में तो नहीं लिखा, मैं जब गया तो कहने लगे डिप्टी साहिब कि कमिशनर साहिब ने नामंज़ूर कर दी, मैंने अपने दिल में कहा , ये क्योंकर हो सकता था जब ये कमिशनर साहिब बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट थे तो में उनको बड़े दिन का कार्ड भेजता था, वो मुझको जानते हैं ख़ैर भाई तो मैं चुप हो रहा और मैंने वही ठेका वाली कोशिश शुरू कर दी लेकिन तुम ने कहा था कि दुकान की भी फ़िक्र करते रहो तो भाई मैं इस तरफ़ से भी ग़ाफ़िल नहीं, अब जो कुछ भी ख़ुदा कर दे मगर आप की दुआ से उम्मीद है कि सब कुछ हो जाएगा। दुकान अमीनाबाद में है जिस में चार दर हैं मगर वो जिन के पास है कहते हैं कि मेरी ज़ाती है, मैं उस को ख़ाली न करूंगा। ये बड़ी मुश्किल है अगर कहीं वो उसकी ज़ाती न होती तो बस मार लिया था, मगर अब क्या हो? और ख़ूब याद आया, यार वो दवाओं वाली तरकीब तो ऐसी लाजवाब है कि ना हल्दी लगे ना फटकरी और रंग चौखा आए, बस तमाम हिंदुस्तान के अख़बारों में इश्तिहार छपवा देना, हैं फिर किया है जब फ़र्माइश आई लिया कोयला और दीवार का प्लास्टर और दोनों को मिला कर पीस लिया। बस दवा तैय्यार है, तो यार एक दिन बैठ कर इश्तिहार बना डालो। मगर तुम तो मिलते ही नहीं, और वो सिंगर कंपनी की एजेंसी भी यूं ही रह गई, तुम अपने वादों को बिलकुल याद नहीं रखते अच्छा तो कल की रही, ज़रूर देखो, फ़र्क़ ना हो ”

– ये तमाम तजावीज़ थीं जिन की तहरीक-ओ-ताईद में आप शरीक थे या जिन का आप से कोई ताल्लुक़ था, वर्ना इन हज़रात के ज़हन में तो नहीं मालूम कितनी तजावीज़ ऐसी भी होंगी जिन से आप को कोई दिलचस्पी नहीं, लेकिन आप की तरह के दूसरे हमदर्दों को दिलचस्पी है मसलन किसी ने तो ये राय दी होगी कि एक होटल खोल लो, अब शख़्स से जो गुफ़्तगु होगी वो तमाम तर होटल के मुताल्लिक़ होगी, किसी दूसरे शख़्स ने वाशिंग फ़ैक्ट्री खोलने की सलाह दी है तो इस से वाशिंग फ़ैक्ट्री के मुताल्लिक़ तबादला-ए-ख़्याल का सिलसिला जारी रहेगा कि धोबियों का इंतिज़ाम कहाँ से किया जाये, कितने धोबी काफ़ी होंगे, कम अज़ कम तीन अलमारियां, दो बड़ी मेज़ें, एक ऑफ़िस टेबल वग़ैरा की ज़रूरत होगी और फिर कपड़ा धोने की जगह का इस तरह इंतिज़ाम किया जाये कि वहां पानी की फ़रावानी भी हो और वो जगह दुकान से क़रीब भी हो। मुख़्तसर ये कि तमाम नशेब-ओ-फ़राज़ सिर्फ़ एक तजवीज़ से ताल्लुक़ रखते हैं और इस तजवीज़ का ताल्लुक़ भी सिर्फ़ एक करमफ़र्मा से है, इसी तरह जितने ख़ुदा ने हमदरद पैदा किए हैं उतनी ही मुख़्तलिफ़ तजावीज़ भी हैं। लेकिन इन हज़रात का ये हाल है कि हर शख़्स की हमदर्दी क़बूल और हर काम को शुरू करने पर इस तरह आमादा कि बस गोया कल ही से शुरू हो जाएगा। अगर आप को अपनी बताई हुई तरकीबों के इलावा इन तमाम तजावीज़ का इलम हो जाये जो आप के बेरोज़गार दोस्त के ज़हन में हैं तो आप को ताज्जुब होगा कि ये शख़्स ऐसा दिमाग़ रखता है जो ख़ज़ाना है तजावीज़ का और हर तजवीज़ के साथ ऐसी मुकम्मल मालूमात इस के ज़हन में महफ़ूज़ हैं कि वो “ज़िंदा इन्साईक्लो पीडीया” बन कर रह गया है और ये सब इसी बेकारी के तुफ़ैल हुआ है जिस से वो किसी ना किसी तरह छूटना चाहता है।
ये जो आप कसीरुल तादाद अदबी रिसाले देख रहे हैं और जो बेशुमार निकल आए गोया कि मिट्टी के पर की तरह के इंशा पर्दाज़ पैदा होगए हैं, इन सब के मुताल्लिक़ अगर आप तहक़ीक़ात करेंगे तो उन के आलम-ए-वुजूद में आने का सबब ज़्यादा तर यही बेकारी हुई होगी, उन्होंने बेकार होने के बाद ये सोचा कि कुछ करना चाहिए, और किसी ने उन को राय दी की अदीब बन जाऐ, मज़मून लिखा करो, बस उन्होंने लिखना शुरू कर दिया और उनही की तरकीब के पैदा होने वाले रिसालों ने इन मज़ामीन को शाये करना शुरू कर दिया। इस “कुंद हमजिंस बाहम जिन्स परवाज़” का नतीजा ये हुआ कि वो हज़रत जिनको हक़ीक़तन अदब से कोई ताल्लुक़ न था अदीब बन गए और वो रिसाला जो नहीं मालूम क्या था इलमी, अदबी रिसाला बन गया, अब कर लीजीए जो कुछ आप कर सकते हैं , ज़्यादा से ज़्यादा आप ये कर सकते हैं कि
अब आबरूए शेवा अहल-ए-नज़र गई

कह कर अपनी “शौकत थानविय्यत” से मुस्ताफ़ी हो जाएं, लेकिन वो लोग तो आप की वजह से मज़ामीन लिखना छोड़ नहीं सकते जिन्होंने अपनी बेकारी का ईलाज उसी को समझा है और जो अपना पहाड़ की तरह न कटने वाला वक़्त मज़मून लिख कर काटते हैं। एक दिन वो भी आने वाला है कि अगर हम ग़ैरतदार हैं और वो हज़रात मुस्तक़िल मिज़ाज लेकिन अगर इसी के साथ एडीटर साहिबान रिसाला जात” की क़दर शनासियाँ भी बाक़ी हैं तो हम वाक़ई एक ऐसा ऐलान करने के बाद ग़ायब हो जाऐंगे कि सब बच्चे दिल से कम अज़ कम एक मर्तबा ये कह दें कि
“ख़ुदा बख़्शे बहुत सी खूबियां थीं मरने वाले में”
(“बहर-ए-तबस्सुम” से लिया गया मज़मून)

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