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भारत में अल्पसंख्यकों के लिए बहुत मुश्किल दौर है: नसरीन जाफरी

अहमदाबाद: भारत के राज्य गुजरात में वर्ष 2002 के मुस्लिम फसादात में अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में दंगाइयों के हाथों मारे जाने वाले पूर्व सांसद एहसान जाफरी की बेटी नसरीन जाफरी का कहना है कि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इस समय बहुत कठिन दौर से गुजर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जब गुजरात जल रहा था तो नरेंद्र मोदी और उनके अधिकारी लोगों को सुरक्षा प्रदान न कर सके, तो अब उनसे वे क्या उम्मीद कर सकते हैं?

आपको बता दें की मुसलमानों की एक समृद्ध आबादी गुलबर्ग सोसायटी में दंगाइयों की भीड़ ने 28 फरवरी 2002 को हमला किया था। इसमें एहसान जाफरी सहित 69 लोग मारे गए थे।अहमदाबाद की एक विशेष अदालत ने इस मामले में दो जून को फैसला सुनाते हुए 24 लोगों को दोषी ठहराया था और 36 लोगों को बरी कर दिया है।

बीबीसी के अनुसार एहसान जाफरी की बेटी नसरीन ने इस फैसले के बाद में अपने विचार पेश किए।उन्होंने कहा हमारी बात सुनी गई। कुछ देर से ही सही, लेकिन हमें सुना गया। 14 साल का लंबा इंतजार था, मेरी माँ के लिए और हम सभी के लिए। हम आगे भी यह लड़ाई जारी रखेंगे।इस फैसले में छोटे मोटे लोगों को जेल भेजा गया है, लेकिन जिन लोगों ने नरसंहार किया था वह अभी भी बाहर हैं। बल्कि उनके विकास हुआ है और उन्हें बड़े पदों पर तैनात किया गया है।

जिस समय घटना हुई वहां पर नहीं थी लेकिन हालात से अच्छी तरह परिचित हैं। मेरे पिता शहर के प्रमुख हस्ती थे। यह शहर उनके परिवार की तरह था और वह 18 साल की उम्र से वहां रह रहे थे। घटना भी दिनदहाड़े हुआ था।

भीड़ जमा हो रहा था, उन्होंने हर किसी को इसकी सूचना दी। हर किसी को पता था कि वह पुलिस से लेकर केंद्र और राज्य सरकार तक से मदद की गुहार कर रहे थे। मैं कह सकता हूँ कि जो लोग भी उनके आसपास थे, उन्होंने मेरे पिता से हर किसी को फोन करने को कहा, इसमें राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे।

मेरा घर अहमदाबाद में काफी सुरक्षित जगह है। यहाँ से दो तीन किलोमीटर की दूरी पर ही सैनिकों का क्षेत्र है और 2 मील पर ही सिविल अस्पताल है। वे किसी गांव में नहीं रहते थे।

सुबह 10 बजे थे। भीड़ जमा हो रही थी, हर कोई परिस्थितियों से परिचित था। भीड़ महिलाओं को खींच रही थी, महिलाओं के साथ यौन अत्याचार कर रही थी, वह बच्चों को मार रहे थे, उन्हें जला रहे थे।

अदालत के इस फैसले का सभी को इंतजार था। विधवाओं की पूरी कॉलोनी, अनाथ बच्चे, जो लोग दंगों में अपने भाइयों, बहनों को खोया था, उन सभी को इस फैसले का बेसब्री से इंतजार था। अदालत के इस फैसले पर पूरी तरह संतुष्ट तो नहीं किया जा सकता लेकिन यह कुछ संतुष्टि देने वाला जरूर है।सबसे संतोष की बात यह है कि देश का एक हिस्सा हमारे साथ है। कई लोगों ने यहां तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है। चाहे गैर सरकारी संगठन हों, या राजनीतिक पार्टियां हों या कुछ हद तक न्यायपालिका भी।

‘यहां तक पहुंचना कतई आसान नहीं था। यह मेरे भाई के लिए आसान नहीं था, जिन्होंने देश छोड़ने से इनकार कर दिया था। यह मेरी माँ और हमारे बच्चों के लिए आसान नहीं था।

यहां यह बात बताना चाहूंगी कि दंगाइयों की भीड़ में शामिल ज्यादातर लोग बाहर से आए थे, वे ट्रकों में भरकर आए थे। उनके पास मोबाइल फोन, वोटर कार्ड और हथियार थे। वे पूरी तैयारी से वहां आए थे।14 साल में गुजरात में बहुत कुछ बदल गया है। अब हालात ऊपरी तौर पर दिनचर्या लगते हैं लेकिन लोगों के दिल बंटे हुए हैं। लोगों के बीच दूरी बढ़ गया है।

रही बात प्रधानमंत्री मोदी की तो मुसलमान भला उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं। जब गुजरात जल रहा था तो नरेंद्र मोदी ही राज्य के मुख्यमंत्री थे और उनके अधिकारी लोगों को सुरक्षा नहीं मुहैया करा सके।अगर वह इस समय लोगों को सुरक्षा नहीं दे पाए तो अब मुसलमान उनसे भला क्या उम्मीद करें। भारत में अल्पसंख्यकों के लिए यह बहुत मुश्किल दौर है।

पूरे अहमदाबाद में आप हिंदू बहुल क्षेत्रों में एक भी मुसलमान परिवार नहीं मिलेगा। शहर पूरी तरह हिंदुओं और मुसलमानों में विभाजित है और इस खाई को भरने की कोई कोशिश नहीं हुई है। यहां तक कि मौजूदा सरकार के साथ काम करने वाले मुस्लिम राजनीतिज्ञ भी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही रहते हैं। उन्हें डर है।

हालांकि यह पहली बार नहीं हुआ था कि मेरे पिता का घर जलाया गया था। 1969 में भी हमारा घर जलाया गया था। उस जगह से मेरे माता-पिता अपना सारा सामना छोड़कर भाग गए थे। हम शरणार्थी शिविर में रह रहे थे। चार साल की उम्र में शरणार्थी शिविर में रही हूं।

लेकिन मेरे पिता फिर लौट कर उसी जगह आए, क्योंकि उन्हें लोकतंत्र में विश्वास था।

nasreen

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