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मआशी इस्लाहात एजंडा

मआशी मसाइल पर इन दोनों सयासी लीडर्स का बिज़नस लीडर्स के साथ अना का मसला चल रहा है। मुल्क की मआशी सुस्त रफ़्तारी के लिए मौजूदा यू पी ए हुकूमत की अदम कारकर्दगी को ज़िम्मेदार टहराने वाले ताजरीन ने ये भी कहा है कि हुकूमत की पालिसीयां, इस्

मआशी मसाइल पर इन दोनों सयासी लीडर्स का बिज़नस लीडर्स के साथ अना का मसला चल रहा है। मुल्क की मआशी सुस्त रफ़्तारी के लिए मौजूदा यू पी ए हुकूमत की अदम कारकर्दगी को ज़िम्मेदार टहराने वाले ताजरीन ने ये भी कहा है कि हुकूमत की पालिसीयां, इस्लाहात एजंडा और मआशी सूरत-ए-हाल ने हालात को अबतर बना दिया है।

बिज़नस लीडर्स के रिमार्कस ने रास्त माहिर मआशियात वज़ीर-ए-आज़म मनमोहन सिंह को मुज़्तरिब करदिया जिस के जवाब में उन्हों ने ताजरीन को हुकूमत पर ग़ैर ज़रूरी और उजलत में तल्ख़ रिमार्कस करने से गुरेज़ का मश्वरा दिया क्योंकि ये रिमार्कस मुल़्क की मआशी रफ़्तार पर मनफ़ी असरात मुरत्तिब करते हैं। हिंदूस्तान की मआशी पैदावार में कमी और सनअती पैदावार में गिरावट का दर्ज होना तशवीशनाक अमर है इस पर संजीदगी से ध्यान देने की ज़रूरत है।

वज़ीर-ए-आज़म ने कौंसल आफ़ ट्रेड ऐंड इंडस्ट्री के इजलास से ख़िताब में मुल़्क की मौजूदा मआशी सूरत-ए-हाल से निमटने के लिए हुकूमत की जानिब से की जा रही कोशिशों की तफ़सील पेश की। एक तरफ़ हुकूमत इस्लाहात के अमल को इत्तिफ़ाक़ राय के बगै़र शुरू करना चाहती है दूसरी तरफ़ रीटेल शोबा में एफडी ए का मसला तात्तुल का शिकार बना दिया गया।

जब बिज़नस लीडर्स हुकूमत की ख़राबियों पर लब कुशाई करते हैं तो उन की बात पर नाराज़ होने वाले वज़ीर-ए-आज़म के पास जो माहिर मआशियात होने के बावजूद मआशी इस्लाहात का ठोस और जुर्रत मंदाना क़दम उठाने वाला नुस्ख़ा नहीं है। अगर तन्क़ीदों के बाइस मुल़्क की मौजूदा मआशी सूरत-ए-हाल से पैदा होने वाले मुश्किलात और चैलेंजस से निमटने में हुकूमत को दुशवारीयों का सामना होता है तो उसे अपनी पालिसीयों पर नज़रसानी करनी चाहीए।

हुकूमत की पालिसीयों से ही जब मआशी सुस्त रवी पैदा हो रही है तो इस का जायज़ा लिया जाय तो रुपय की क़दर में कमी जैसे सच्च का सामना करना नहीं पड़ता। बिलाशुबा हुकूमत ने पैदावार पर मबनी मआशी माहौल और फ़िज़ा पैदा करने की कोशिश की है मगर अंदरून-ए-मुल्क मआशी सूरत-ए-हाल को आलमी कसादबाज़ारी या मालीयाती बोहरान के तनाज़ुर में देख कर हुकूमत हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती।

यूरोज़ोन का बोहरान, अमरीका की मआशी पैदावार में गिरावट से मुस्तक़बिल क़रीब में हालात मज़ीद दगरगों हो सकते हैं। इस लिए हिंदूस्तान में मआशी इस्लाहात के एजंडा को मूसिर बनाना ज़रूरी है इस में दो राय नहीं कि मर्कज़ में एक मख़लूत हुकूमत को ठोस और जुर्रत मंदाना क़दम उठाने में पिस-ओ-पेश करना पड़ता है क्यों कि उसे हलीफ़ पार्टीयों का सहारा लेना एक मजबूरी है।

मख़लूत हुकूमत में कोई भी क़दम उठाने से क़बल हुकूमत को अपने हलीफ़ पार्टीयों का साथ लेना ज़रूरी ही। मुख़्तलिफ़ मसाइल पर हलीफ़ पार्टीयों की अपनी तशवीश होती है। हर पार्टी की तशवीश और फ़र्माइश पर ध्यान दिया जाने लगे तो मआशी इस्लाहात के अमल को आगे ले जाने की कोशिश कारगर नहीं होसकेगी। हस्सास मुआमलों पर हलीफ़ पार्टीयों को ही एतिमाद में लिया जाये तो कहीं भी कोई रुकावट पैदा नहीं होगी क्योंकि कोई भी पार्टी मुल़्क की मईशत के लिए अहम पालिसीयों की मुख़ालिफ़त नहीं कर सकती।

हलीफ़ों को भी इस बात का अंदाज़ा होना चाहीए कि आलमी सतह पर मालीयाती और मआशी सूरत-ए-हाल किया है। इन पार्टीयों के लिए इंतिख़ाबात में कामयाबी हासिल करना ही असल हदफ़ नहीं होना चाहीए बल्कि मुल़्क की मईशत और उन के राय दहिंदों की आरजुओं की तकमील के लिए किया इक़दामात किए जा सकते हैं इस पर ध्यान दिया जाना भी इन का फ़रीज़ा है। आलमी मआशी फ़िज़ा बिलख़सूस यूरोज़ोन बहुत तेज़ रफ़्तारी के साथ बद से बदतरीन की जानिब जा रहा है।

उभर ने वाली मईशतें भी सुस्त रवी का शिकार हैं। अमरीका में इंतिख़ाबात मुनाक़िद हो रहे हैं जिस की वजह से वहां की इंतिख़ाबी सियासत और ओबामा नज़म-ओ-नसक़ की पालिसीयां दीगर अक़्वाम की मईशत को ही मुतास्सिर करसकती हैं। हिंदूस्तान की मईशत और रुपया की क़दर में कमी से ये अंदाज़ा कर लेना चाहीए कि अमरीकी मआशी पालिसीयां दीगर अक़्वाम को मसाइल से दो-चार कर सकती हैं।

हिंदूस्तान को अपनी मईशत के लिए एहतियात पसंदी के साथ कोई ऐसा हल तलाश करने की ज़रूरत होगी जिस से बिज़नस लीडर्स को तन्क़ीदों का मौक़ा ना मिल सकी। बाअज़ औक़ात ऐसे मसाइल होते हैं जिन से उलझनें पैदा होती हैं। हुकूमत की पालिसी के ऐलान के बाद भी चंद गोशों से तन्क़ीदें होती हैं तो पालिसी को रोक देना पड़ता है जैसा कि रीटेल शोबा में बैरूनी रास्त सरमाया कारी को रोक दिया गया। लेकिन इस का मतलब ये नहीं होना चाहीए कि हुकूमत अपना काम काज ही तर्क करदे या ग़ौर-ओ-फ़िक्र छोड़ दे।

इस की ज़िम्मेदारी है कि वो हर पालिसी को मूसिर बनाई। आलमी कसादबाज़ारी मआशी पैदावार में इन्हितात के मद्द-ए-नज़र मुल़्क की क़ियादत को मआशी माहिरीन और तिजारती ग्रुप के आला अफ़राद से मुशावरत करी। सयासी पार्टीयां चाहीए वो हुक्मराँ जमात हो या अप्पोज़ीशन हर दो का क़र्ज़ है कि वो अवाम की बहबूद, मआशी ख़ुशहाली और सस्ते अनाज का इंतिज़ाम करें।

इन का निशाना सिर्फ वोट नहीं होना चाहीए सिर्फ़ इंतिख़ाबात में कामयाबी हासिल करने और वोट के हुसूल की कोशिश को अज़ीज़ रख कर पार्लीमैंट और असैंबलीयों के अराकीन की तादाद बढ़ाने की फ़िक्र से अवामी तरक़्क़ी के मक़ासिद पूरे नहीं होती। हालिया बरसों में सयासी सतह पर ऐसा ही कुछ हो रहा है जिस से मआशी महाज़ पर अबतरी आई है।

इफ़रात-ए-ज़र की शरहों को देख कर आर बी आई को अपनी पालिसीयों पर नज़रसानी करनी पड़ी। इस तरह की तबदीलीयां हिंदूस्तान की मआशी सेहत के लिए इंतिहाई तबाहकुन होंगी। जैसा कि वज़ीर-ए-आज़म ने बिज़नस लीडर्स को बताया कि इन की हुकूमत इस्लाहात के एजंडा पर अमल करने की पाबंद अह्द तो इस को पूरा करना चाहीए ताकि मुल़्क की सनअती तरक़्क़ी अपने असल हदफ़ को हासिल कर सकें।

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