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मसाजिद में मोबाईल फोन्स सुईच आफ़ करने शहर की एक मस्जिद की मुनफ़रद अपील

हैदराबाद ।०७। सितंबर : मोबाईल फोन्स हमारी ज़िंदगीयों का एक लाज़िमी हिस्सा बन गए हैं । इंसान मुवासलाती टैक्नालोजी की इस छोटी सी तख़लीक़ का ऐसे आदी होगया है कि वो इस का साथ छोड़ने का तसव्वुर भी नहीं करसकता । मोबाईल फ़ोन ने फ़ासले घट

हैदराबाद ।०७। सितंबर : मोबाईल फोन्स हमारी ज़िंदगीयों का एक लाज़िमी हिस्सा बन गए हैं । इंसान मुवासलाती टैक्नालोजी की इस छोटी सी तख़लीक़ का ऐसे आदी होगया है कि वो इस का साथ छोड़ने का तसव्वुर भी नहीं करसकता । मोबाईल फ़ोन ने फ़ासले घटा दीए हैं दूरियां मिटा दी हैं ।

घर हो या ऑफ़िस छोटे से लेकर बड़ों तक हर किसी के हाथों में मोबाईल ज़रूर नज़र आएगा । सरमाया दारों की ख़ुद गिरिज़ा ना पालिसी के नतीजा में इन लोगों ने भी मोबाईल ख़रीदा है जो दो वक़्त की रोटी का बड़ी मुश्किल से इंतिज़ाम कर पाते हैं अगरचे मोबाईल में कई खूबियां और खामियां हैं लेकिन इस्तिमाल करने वाले परमुनहसिर है अगर वो इस का बेहतर अंदाज़ में इस्तिमाल करे तो ये सब से अच्छी बात है और मोबाईल के बेहतर इस्तिमाल की बहुत ज़्यादा गुंजाइश भी है ।

अगरचे मोबाईल फोन्स की एहमीयत मुस्लिमा है लेकिन जब मस्जिद की बात आती है तो एक तरह से ये नमाज़ों में ख़लल पैदा करने का ज़रीया भी दिखाई देता है । नमाज़ों की अदायगी के दौरान आप और हम ने कई बार फोन्स की रंग टोन बजती हुई सुनी हैं । अफ़सोस तो इस बात पर होता है कि इमाम साहिब नमाज़ पढ़ा रहे हैं मुसल्ली बड़े ही ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू के साथ अपने रब ज़ौ अलजलाल के दरबार में टहरे आजिज़ी वानकसारी का पैकर बने हुए हैं । ये तसव्वुरकरते हुए कि हम अल्लाह ताली के सामने खड़े हैं या हमारा रब हमें देख रहा है ।

मुस्लियों की आँखों से आँसू रवां हैं । आयात करानी सुन कर उन के वजूद में सुकून-ओ-इतमीनान की एक मुक़द्दस लहर दौड़ रही है ऐसे में अचानक किसी मुसल्ली का फ़ोन बज उठता है और किसी फ़िल्म का गाना सारे मस्जिद में गूंजने लगता है । इस के साथ ही मुस्लियों में बेचैनी शुरू हो जाती है ।

इमाम साहिब को दिल ही दिल में बहुत ग़ुस्सा आता है फ़ोन पर गाने का सिलसिला जारी रहता है या कोई म्यूज़िक वग़ैरा बजती रहती है कुछ देर तक मस्जिद में इस तरह की ग़ैर शरई हरकत का सिलसिला जारी रहता है । फिर दूसरी जानिबसे फ़ोन करने वाला काल ख़तन करदेता है । इस तरह की सूरत-ए-हाल आप ने शहर की हर मस्जिद में देखी होगी ।

यही वजह है कि अब मस्जिदों में ऐसे बोर्डस चस्पाँ या आवेज़ां किए जा रहे हैं जिस में मुस्लियों से दरख़ास्त की जाती है कि बराए मेहरबानी अपने मोबाईल फ़ोन सोइच आफ़ करलीं ताकि दौरान नमाज़ मुस्लियों को ख़लल ना हो लेकिन अक्सर-ओ-बेशतर नमाज़ों के दौरान ही किसी का मोबाईल बज उठता है ।

राक़िम उल-हरूफ़ ने शहर की हर मस्जिद में मोबाईल फ़ोन सोइच आफ़ करने से मुताल्लिक़ हिदायात परमुश्तमिल बोर्डस या पोस्टर्स देखे हैं लेकिन मस्जिद नूर मुहम्मद शरीफ़ आराम घर के नोटिस बोर्ड पर इस बारे में जो अपील या दरख़ास्त दर्ज की गई है वो अपनी नौईयत की मुनफ़रद और ग़ैरमामूली है । मोबाईल फोन्स से मुताल्लिक़ इस तरह की अपील कायक़ीनन मुस्लियों पर ज़रूर असर होगा । क़ारईन आप को बतादें के मस्जिद नूर मुहम्मदशरीफ़ आराम घर के नोटिस बोर्ड के सब से ऊपर अल्लाह अकबर तहरीर किया गया है । इस के नीचे अल्लाह से राबिता शुरू और मख़लूक़ से राबिता ख़तन और तीसरी सत्र में अपने मोबाईल फ़ोन बंद करें , जज़ाकल्लाह लिखा गया है ।

मुख़्तसर लेकिन जामिअलफ़ाज़ में मुस्लियों को ये समझाने की कोशिश की गई कि नमाज़ दरअसल अल्लाह सेबंदा का राबिता है और इस राबिता के दौरान थोड़ी से भी ग़फ़लत , मुदाख़िलत या ख़ललइंतिहाई ना पसंदीदा-ओ-नागवार अमल है बल्कि इस मुक़द्दस-ओ-मुबारक राबिता के दौरान फ़हश गाने , मूसीक़ी मुख़्तलिफ़ जानवरों की आवाज़ें , अजीब-ओ-ग़रीब अंदाज़ में चीख़-ओ-पुकार , हँसने रोने की आवाज़ों , बच्चों की किलकारियों , पर मुश्तमिल रंग ट्विन्स का मोबाईल फ़ोन पर अचानक बज उठना ना सिर्फ अल्लाह ताली और बंदे के राबिता को तोड़ने का बाइस बनता है बल्कि इस ग़ैर शरई फे़अल से मसाजिद की बेहुर्मती भी होती है ।

हद तो ये है कि बाअज़ रंग ट्विन्स ऐसी भी होती हैं जिस में फ़ोन उठा फ़ोन उठा जैसी आवाज़ें आप को सुनाई देंगी । मसाजिद तो अल्लाह के घर होते हैं इस का तक़द्दुस मुस्लमानों के लिए जान से भी ज़्यादा अहम होता है । फिर हम इस जानिब तवज्जा ही नहीं करते । कमअज़ कम फ़ोन करने वालों को इस बात का एहसास तो होना चाहीए कि वो जिस शख़्स को फ़ोन कररहे हैं वो मुस्लमान है और मुस्लमान नमाज़ नहीं छोड़ता ।

ऐसे में इन का मतलूबाशख़्स नमाज़ पढ़ रहा होगा । वैसे भी अगर हम नमाज़ों के दौरान अपना मोबाईल फ़ोन बंद रखें तो कोई क़ियामत तो बरपा नहीं होगी या हमारा बहुत बड़ा नुक़्सान होजाएगा । अगर दिन में 50 मिनट यानी ये नमाज़ के दौरान 10 मिनट मोबाईल बंद रखें तो आप से फ़ोन पर राबिता करने वालों को अंदाज़ा होजाएगा कि भाई वो शख़्स तो उस वक़्त नमाज़ में रहता है और मुम्किन है कि वो भी शर्मिंदगी के मारे मसाजिद का रुख करने लगीं ।

मस्जिद नूर मुहम्मद शरीफ़ के नोटिस बोर्ड पर दर्ज अपील को पढ़ कर ही हम ने सोचा कि आज क़ारईन को मोबाईल फोन्स पर फ़हश रंग ट्विन्स की लानत के बारे में बताएं । इस मस्जिद के मुतवल्ली साहिब से बात की तो बताया अगर हमारे अमल से कोई सुधर जाय तो यही हमारी बड़ी कामयाबी है । बोर्ड पर इस तरह की पुरकशिश-ओ-पर असर अपील के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्हों ने बताया कि छः माह क़बल रोज़नामा सियासत में एक मज़मून शाय हुआ था ।

इस मज़मून को पढ़ कर हम ने सोचा कि क्यों ना उस तहरीर के चंद जुमलों को अपनी मस्जिद के नोटिस बोर्ड पर लिखवाएं इस तरह ये अलफ़ाज़ मस्जिद के नोटिस बोर्ड पर लिखवाए गए । क़ारईन आप ने आम मौक़ों के इलावा जनाज़े की नमाज़ों के दौरान भी देखा होगा कि लोग फ़ोन पर महव गुफ़्तगु रहते हैं । ये नमाज़ सिर्फ दो मिनट की होती है इस दौरान भी चंद लोगों की बेचैनी देख कर उन की हालत पर रहम आता है जब कि दो मिनट में कोई बड़ा इन्क़िलाब आने वाला नहीं होता फिर भी अयननमाज़ जनाज़ा के वक़्त भी लोग मोबाईल फोन्स को ऑन रखते हैं ।

इस के इलावा कई ऐसे लोग होते हैं जो आम दिनों में हमें और आप को मसाजिद के कोनों में फ़ोन पर बात करते दिखाई देते हैं । मसाजिद के कोने कोने चप्पा चप्पा में घूम कर वो बात करते हैं । यहां तक कि वुज़ू ख़ाना और तहारत ख़ाने के क़रीब भी ऐसे बेवक़ूफ़ नज़र आते हैं । जिन के मोबाईल फोन्स कानों पर लगे होते हैं और उन के मुंह अजीब-ओ-ग़रीब अंदाज़ में दिखाई देते हैं । चेहरों पर तास्सुरात से तो ऐसे लगता है जैसे वो नॉर्मल नाहों । आजकल ये बात भी देखने में आरही है कि मसाजिद में मोबाईल फ़ोन के मसला पर बेहस-ओ-मुबाहिस भी होरहे हैं ।

तल्ख़ गुफ़्तगु कभी कुभार लड़ाई झगड़ों की शक्ल भी इख़तियार कररही है ।चुनांचे बेहतर यही है कि अल्लाह से मज़बूत राबिता और इस के बंदों की इबादात में ख़ललपैदा ना होने को यक़ीनी बनाने के लिए नमाज़ों के औक़ात में मोबाईल फोन्स को पूरी तरह सोइच आफ़ ( बंद ) करदेना चाहिए ।।

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