Wednesday , October 18 2017
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मसीहा बन के जो लूट लेते हैं…. दूसरी क़िस्त

जेनेरिक मेडीसिन के मुक़ाबले मीआर के नाम पर ब्रांडेड अदवियात का फ़रोग़, ज़िम्मादारकोन?

जेनेरिक मेडीसिन के मुक़ाबले मीआर के नाम पर ब्रांडेड अदवियात का फ़रोग़, ज़िम्मादारकोन?
पराइवेट इदारे में मुलाज़िम मिस्टर रफीक हमद को डाक्टर ने उन्हें एक दवा Entac तजवीज़ की जिसकी कीमत 67 रुपये फ़ी 10 टाबलेट थी ,लेकिन मिस्टर रफीक ने इस के बजाय दूसरी कंपनी की Lantac ख़रीद ली जो इसी मर्ज़ केलिए थी । इसकी कीमत महिज़ 3.60 रुपये फ़ी 10टाबलेट थी,इस तरह उन्होंने94.6% यानी 63.4 रुपये की बचत की…

सवाल ये है कि एक ही मर्ज़ की दवा जो एक ही फार्मूले और मशमूलात (ingredients)के तहत बनाई गई हो, उस की क़ीमतों में इतना फ़र्क़ क्यों होता है? कैसे होताहै ?और इसकी क्या वजूहात हैं? नुमाइंदा सियासत ने जब इस हवाले से शहर के एक मशहूर हॉस्पिटल से वाबस्ता डाक्टर सी चंद्रा मोहन से बात की तो उन्हों ने उसकी चंद अहम वजूहात बताइ जिसे आप बाआसानी समझ सकते हैं।

बाक़ौल उनके , पहली वजह आम तौर पर ब्रांडेड वो दवाएं होती हैं जिसे किसी एक मख़सूस कंपनी ने काफ़ी रिसर्च एंड डेवलपमेन्ट के बाद तैय्यार क्या हो ,इस डेवलपमनट के बाद patent law के ज़रीया उसे क़ानूनी हुक़ूक़ हासिल होजाते हैं।यानी कोई दूसरी दवासाज़ कंपनी उसकी नक़ल नहीं करसकती , इसी लिए इस दवा की मार्किटिंग मैनूफ़ैक्चररस के नाम से की जाती है..लेकिन उसकी एक मुद्दत होती है और जब एक बार मुद्दत ख़त्म हो जाए तो उसी दवा को बनाने दूसरी बेशुमार कंपनियां मैदान में आजाती हैं ।

तीसरी वजह ये है कि दवाएं दो किस्म की होती हैं , एक वो है जिसकी कीमतें हुकूमत मुक़र्रर करती है ,जबकि दूसरी वो क़िस्म है जिस पर हुकूमत को कोई कंट्रोल नहीं रहता और कंपनियां बगैर किसी रुकावट के मनमानी कीमतें मुक़िर करती हैं।चौथी वजह ये है कि बड़ी दवासाज़ कंपनियां अपने सेल्स एगज़केटिव के ज़रीया डाक्टरों को उनकी दवाएं लिखने राग़िब करलेते हैं जिसके नतीजे में उनकी दवाएं ज़्यादा फरोख्त होती हैं …

और जो दवा ज़्यादा फरोख्त होती है Pharmacists उन्ही दवाओं का स्टाक रखने में अपना फ़ायदा तसव्वुर करता है ,दूसरी तरफ़ डॉक्टर्स छोटी कंपनियों की या जेनेरिक दवाएं शायद कभी अपने मरीज़ों को तजवीज़ करते हैं ,इसलिए एसटाकिसट भी बड़े मार्जिन के चक्कर में जेनेरिक दवाओं की बजाय बड़ी कंपनीयों की दवाएं ही स्टाक रखते हैं जिसके वजह से जेनेरिक दवाओं का चलन ना के बराबर होकर रह गया है …

मगर डॉक्टर्स-ओ-दवासाज़ कंपनीयों की मफ़ाद परसताना गठजोड़ की कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है …जिसकी कमाई का निस्फ़ हिस्सा ईलाज के ही नज़र हो जाता है। (जारी है)

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