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मसीहा बन के जो लूट लेते हैं… आख़िरी क़िस्त

(मुहम्मद जसीम उद्दीन निज़ामी)हुकूमत की जानिब से अवाम के लिए फ़राहम की जाने वाली तिब्बी सहूलयात के हवाले से अक्सर ये शिकायत रहती है कि यहां ईलाज की मुनासिब सहूलतें दस्तयाब नहीं होतीं , डॉक्टर्स लापराह होते हैं और वहां लंबी क़तारों

(मुहम्मद जसीम उद्दीन निज़ामी)हुकूमत की जानिब से अवाम के लिए फ़राहम की जाने वाली तिब्बी सहूलयात के हवाले से अक्सर ये शिकायत रहती है कि यहां ईलाज की मुनासिब सहूलतें दस्तयाब नहीं होतीं , डॉक्टर्स लापराह होते हैं और वहां लंबी क़तारों में टहरने तकलीफ़ सहनी पड़ती है ।

सरकारी दवा ख़ानों का ये मनफ़ी पहलू ज़राए इबलाग़ (मिडिया)में भी इस क़दर छाया रहता है कि सरकारी दवाखाने में औसत तबक़ा तो क्या निसबतन गरीब समझे जाने वाले अफ़राद भी सरकारी दवा ख़ानों का रुख़ करना अपनी शान के ख़िलाफ़ तसव्वुर करने लगे हैं।

ताहम इस का मनफ़ी नतीजा ये निकला कि प्राइवेट दवाखाने और दवासाज़ कंपनियों ने पेशा तिब्ब जैसे बाइज़्ज़त पेशे को लूट खसूट का एक अहम ज़रीया बना दिया । आज की इस रिपोर्ट में जिस पहलू की तरफ़ अवामुन्नास (जनता)की तवज्जा मबज़ूल करवाई जा रही है वो है बच्चों के लिए टीका अंदाज़ी ।

चूँकि टीका अंदाज़ी के नाम पर खानगी दवाख़ानों में जिन टीकों के लिए 200 ता 700 रुपये वसूल किए जा रहे हैं ,वही टीके सरकारी दवाखाने ,हता के महल्लों में मौजू दे यू पी एच सी (अर्बन पब्लिक हेल्थ सेन्टर) में भी बिलकुल मुफ़्त फ़राहम किए जाते हैं, मगर अवाम की अक्सरियत अपने इलाक़े में मौजूद यू पी एच सी के बजाय प्राइवेट दवाखाने और क्लीनिक में ही टीका अंदाज़ी करवाना बाइस इत्मीनान तसव्वुर करते हैं।

और फिर ये शिकायत भी करते हैं कि डॉक्टर्स इन्हें लूट रहे हैं। इसके इलावा एसे टीके जो डॉक्टर के मुताबिक़ लाज़िमी नहीं बल्कि इख़तियारी है ,वो टीके प्राइवेट दवाखाने और क्लीनिक्स में फ़ी टीका 1100 ता 500 रुपये में दिया जा रहा है।

और इस तरह एक हफ़्ता से पाँच साल की उमर तक के बच्चों को दिलाए जाने वाले सिर्फ़ टीके पर ही अवाम को मजमूई तौर पर 5 ता 6 हज़ार रुपये ख़र्च करने पड़ रहे हैं। लेकिन अगर यही टीके (जिन में से ज़्यादा तर सरकारी दवा ख़ानों और पी एच सी में दस्तयाब है) सरकारी दवाखाने में दिलाएं जाउं तो पाँच ता छ हज़ार रुपये की बचत होगी ,जोकि आज के इस महंगाई के दौर में काफ़ी अहमियत रखता है।

माहिर इतफ़ाल डाक्टर चंद्रा मोहन एम बीबी एस के मुताबिक़ सरकारी दवा ख़ानों के हवाले से अवामुन्नास के ज़हनों में मौजूद शकूक शुबहात की बुनियाद पर वो उमूमन पराईवेट क्लीनिक्स में ही अपने बच्चों की टीका अंदाज़ी करवाने को तर्जीह देते हैं हालाँकि तमाम लाज़िमी टीके सरकारी दवाखानों में दस्तयाब हैं ।

बहरहाल ये एक हक़ीक़त है कि महज़ गैर ज़रूरी शक शुबहात की बुनियाद पर सरकारी सहूलयात से गुरेज़ करने के बजाय अगर हम इन सहूलयात से इस्तिफ़ादा करें तो हम अपनी कमाई की एक ख़ातिर ख़वाह रक़म बचा सकते हैं,

ना सिर्फ़ टीके के मुआमले में बल्कि दीगर अमराज़ मुआमले में भी अपने पैसों की बचत कर सकते हैं, और प्राइवेट दवाखानो की लूट खसूट को ख़त्म ना सही कम ज़रूर कर सकते हैं।

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