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महकमा ट्रैफ़िक : ख़ानगी क्रेनों का इस्तिमाल बॉलर अस्त आमदनी का ज़रीया..?

हैदराबाद २‍६ फरवरी ।( सियासत न्यूज़) शहर में बढ़ती हुई ट्रैफ़िक और उसके नतीजे में बढ़ते हुए ट्रैफ़िक मसाइल हुकूमत और अवाम दोनों केलिए एक अहम तरीन मसला बनता जा रहा ही। ट्रैफ़िक पुलिस की जानिब से उन मसाइल पर क़ाबू पाने के हवाले से कई

हैदराबाद २‍६ फरवरी ।( सियासत न्यूज़) शहर में बढ़ती हुई ट्रैफ़िक और उसके नतीजे में बढ़ते हुए ट्रैफ़िक मसाइल हुकूमत और अवाम दोनों केलिए एक अहम तरीन मसला बनता जा रहा ही। ट्रैफ़िक पुलिस की जानिब से उन मसाइल पर क़ाबू पाने के हवाले से कई एक क़ानून और उसूल बनाए गए हैं मगर अफ़सोसनाक पहलू ये है कि ट्रैफ़िक उसूल -ओ-क़वानीन के तईं एक तरफ़ जहां अवाम लाशऊरी का मुज़ाहरा करते हैं तो वहीं ख़ुद ट्रैफ़िक अमले की जानिब से उन क़वानीन और उसूलों की ना सिर्फ अनदेखी और लापरवाही बरती जा रही है बल्कि बाअज़ आली ओहदेदार अपने ओहदे और असर-ओ-रसूख़ को इस्तिमाल करते हुए इन डाइरेक्ट आमदनी के हुसूल में मसरूफ़ हैं , जिस से अवाम ये सोचने पर मजबूर होगए हैं कि जब ट्रैफ़िक ओहदेदार ख़ुद ट्रैफ़िक उसूलों की ख़िलाफ़ वरज़ य केमुर्तक़िब होरहे हैं तो फिर वो क्यों इन उसूलों की पासदारी करें?

उनका कहना है कि क्या ट्रैफ़िक उसूल या का नौ नून सिर्फ़ अवाम के लिए है या क़ानून सब केलिए बराबर ही?।वैसे तो मुताल्लिक़ा महिकमा के अमला की जानिब से कई एक क़वानीन की ख़िलाफ़वरज़ी की जाती है मगर आज सिर्फ एक मसले की तरफ़ उनकी तवज्जा मबज़ूल करवाई जा रही है औरवह है ट्रैफ़िक पुलिस की क्रेन गाड़ी , जिनकी अक्सरीयत क़रीबी आदमीयों से किराए पर हासिल की गई है ।बावसो क ज़राए के मुताबिक़ , ये ख़ानगी क्रेंस जिस में एक ऐस आई , दो ड्राईवर (एक दिन के वक़फ़ा से 24घंटे की डयूटी) दो ऑप्रेटर और एक होम गार्ड परमुश्तमिल होता है का, मुताल्लिक़ा महिकमा की जानिब से यौमिया 4200 रुपय किराया (बिशमोल पैट्रोल और दीगर अख़राजात) अदा किया जाता है, यानी फ़ी क्रेन माहाना किराया एक लाख 26हज़ार रुपय अदा किया जाता ही, इस क़दर ख़तीर रक़म किस के जेब में जाती है ? इस का अंदाज़ ह करना ज़्यादा मुश्किल नहीं है।

सवाल ये है कि मुताल्लिक़ा महिकमा हुकूमत के पैसों से ये क्रेनें क्यों नहीं खरीदकर इस्तिमाल कर रहा है ?।महिकमा ट्रैफ़िक के ही एक ओहदेदार ने अपना नाम मख़फ़ी रखने की शर्त पर सियासत को बता या कि ट्रैफ़िक पुलिस की जानिब से शहर में इस्तिमाल किए जाने वाले करनियों में से सरकारी क्रेनों की तादाद सिर्फ 7है जबकि ख़ानगी क्रेनों की तादाद 14ही, । ज़राए के मुताबिक़ 2003मेंजिस वक़्त मिस्टर सिरी नेवास रेड्डी डी सी पी 1 ट्रैफ़िक के ओहदे पर फ़ाइज़ थी, और ऐडीशनल सी पी,मिस्टर डी टी नाविक थी, उस वक़्त ज़बत किए हुए गाड़ीयों के दस्तावेज़ात को अवामको वापिस करने के लिए एक सीज़ डॉक्यू मिनट मेला का एहतिमाम किया था जो एक हफ़्ता जारी रहा,इस मेले में कम से कम चालान अदा करते हुए अवाम को अपने काग़ज़ात वापिस हासिल करने की सहूलत दी गई थी ,बादअज़ां ई सेवा के ज़रीया ये काम कराने की कोशिश की गई मगर वो भी नाकाम हो गया, बताया जाता है कि उन्हें के दौर में प्राईवेट क्रेंस हासिल करने का सिलसिला शुरू हुआ जो आज तक जारी ही,और मुताल्लिक़ा ओहदेदार सरकारी क्रेंस ख़रीदने के बजाय ख़ानगी क्रेंस को किराया पर हासिल करने को तर्जीह देते रहे हैं।मगर इस से अवामी पैसों का कितना नुक़्सान होरहा है इस पर कोई तवज्जा देने तैय्यार नहीं ।

ज़राए के मुताबिक़ ,पहले इस तरह की गाड़ीयों की देख भाल और मेन्टनस केलिए पुलिस ट्रांसपोर्ट आर्गेनाईज़ेशन PTO में मुताल्लिक़ा अफ़राद की तक़र्रुरी अमल में आती थी जबकि अब ये सिर्फ़ ड्राईवर के लिए ही महिदूद हो कर रह गया है।सवाल ये है कि अगरमुताल्लिक़ा महिकमा ख़ानगी क्रेनों से काम चलाना चाहती है तो रिज़र्व इन्सपैक्टर (I) जिसे अडमीन भी कहा जाता ही, की ज़रूरत ही कियाहै ,जोकि डीज़ल ओरलाक बिक वग़ैरा का ज़िम्मेदार होता है।

दूसरी तरफ़ एक दिलचस्प पहलू ये है कि इन क्रेनों में से कई ऐसी क्रेनें हैं जो महीनों सी/Rनंबर पर चलाई जा रही हैं जिन्हें कोई कुछ नहीं कह सकता।अवाम का कहना है कि अगर आम आदमी की गाड़ियां टी आर नंबर की मुद्दत के बाद रोड नज़र आती हैं तो MV Act 192 (1) के तहत 1000ता 2000रुपय चालान कर दिया जाता है मगर ख़ुद इस किस्म के क्रेन महीनों से टी आर नंबर पर बे ख़ौफ़ वख़तर चलाई जा रही है जिस पर्कसी किस्म के चालान का तसव्वुर नहीं किया जा सकता। अवाम का कहना है कि वो ये जानना चाहती है कि आख़िर अवाम और मुताल्लिक़ा की गाडियो के दरमियां ये इमतियाज़ीरवैय्या क्यों इख़तियार किया जा रहा ही?और क्या इन क्रेनों के किराया जमा करने केलिए अंधा धुंद चालान किया जा रहा है या ट्रैफ़िक बहाली की लिए? अगर ट्रैफ़िक बहाली के लिए है तो अवामी मुक़ामात ,बैंक ,ए टी एम्स ,होटल,कॉलिजस और दीगर मुक़ामात जहां गाड़ी टहराना अवाम की मजबूरी ही, वहां इंतिज़ामीया को पार्किंग जगह फ़राहम करने केलिए मजबूर करने के बजाय अवाम कोई चालान भरने केलिए क्यों मजबूर किया जाता है ? ।

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