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महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनी “ज़ैनब बी” ने मस्जिद में स्कूल लगाकर पढाया महिलायों को !

फोटो: नई दुनिया

मध्य प्रदेश : श्योपुर में मुस्लिम समाज में बेटियों को स्कूल में पढ़ने में दिलचस्पी नहीं होने की बात एक महिला को इतनी नागवार गुजरी की बेटियों को पढ़ाने के लिए मस्जिद में ही स्कूल खोल दिया। 61 साल पहले बेटी पढ़ाओं का अभियान शुरू करने वाली जेनब बी को श्योपुर में जौरा वाली आपा के नाम से पुकारा जाता है। जौरा वाली आपा ने मुस्लिम समाज की महिलाओं में शिक्षा का अलख ऐसा जगाया कि आज 4 हजार से ज्यादा घरों में उनके द्वारा पढ़ाई गई महिलाएं मिलेगी। कई महिलाएं जेनब बी से शिक्षा लेकर आज सरकारी नौकरियां कर रही हैं। जौरा वाली आपा पूर्व मंत्री स्व. मो. इब्राहिम कुरैशी की मां है। जिनकी उम्र अब करीब 90 साल की है।

जेनब बी का जन्म मुरैना में हुआ था। उनके पिता रमजान अली पेशे से शिक्षक थे। मुस्लिम समाज में उस समय बालिका शिक्षा के प्रति अरुचि थी। रमजान अली पूरे मुरैना जिले में इकलौते ऐसे मुस्लिम व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी बेटी को मैट्रिक पास कराया था। मुस्लिम समाज में महिलाओं में शिक्षा के प्रति अरुचि हमेशा ही जेनब बी के मन में खटकती थी। अपनी मां अन्य परिजनों के विरोध के बावजूद जेनब बी ने 1951 में जौरा के अलापुर गांव में प्राढ शिक्षा केंद्र में महिलाओं को पढ़ाने का काम शुरू किया। 4 साल बाद वे अपने शिक्षक पति कासिम कुरैशी के साथ ट्रांसफर होकर श्योपुर आ गई। वहाँ पर मुस्लिम बेटियों को पढाने की ललक में उन्होंने शहर की इकलौती जामा मस्जिद में ही स्कूल लगा लिया। मस्जिद कमेटी ने लड़कियों को पर्देदारी में रखने की शर्त पर उन्हें मस्जिद में स्कूल लगाने की इजाजत दे दी। फिर क्या था, देखते ही देखते स्कूल में पढ़ने वाली बेटियों की लाइन लग गई। कुछ ही दिनों में मस्जिद में चलने वाला कन्या उर्दू प्राथमिक स्कूल जिले के सबसे बड़े स्कूल में शुमार हो गया। आज शहर में ऐसा कोई परिवार नहीं है जिसमें जेनब बी द्वारा पढ़ाइ गई महिला न मिले।

अलापुरा में महिलाओ को साक्षर करने के लिए जेनब बी घर के पिछले गेट से चादर ओढक़र निकलती थी। अपने पति कासिम कुरैशी से मिले समर्थन और होंसले से आज जेनब बी के द्वारा पढ़ाई गई मुस्लिम महिलाओं में करीब 40 महिलाएं ऐसी है जो कई सरकारी स्कूलों में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

हमनें जामा मस्जिद में जौरा वाली आपा के पास प्राथमिक शिक्षा पूरी की। इसके बाद हौसला बढ़ा तो पोस्ट ग्रेजुऐशन किया। मेरी तरह मुस्लिम समाज में कई लड़किया है जो जौरा वाली आपा के कारण ही आज समाज में अपने आप को पढ़ी लिखी कह सकती है।


नसीमा खातून

वरिष्ठ शिक्षका, मिडिल स्कूल रायपुरा।

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