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महफ़िल-ए-शायराना #2

क्यूँ शाख पे बैठे हो उड़ क्यूँ नहीं जाते,

ऐ वादा फरामोश सुधर क्युँ नहीं जाते।

 

कब से बैठे हो मेरी घर की चोखट पे,

किस नगरी से आये हो घर क्युँ नहीं जाते।

 

मैं तो ग़म-ए-तन्हाई में हूँ खामोश बैठा,

ऐ बादलो गरजते क्युँ हो बरस क्युँ नहीं जाते।

 

अब तो ये आलम है दीवानगी में ऐ दोस्त,

कहती है दुनिया कब तक जिओगे मर क्युँ नहीं जाते।

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