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माइनारीटीज‌ को कर्जें देने में टाल मटोल, मगर वाजिबात में हर साल इज़ाफ़ा

* 16.61 करोड़ रुपये की बमुश्किल तक़सीम और 12,124.31 करोड़ रुपये वसूल तलब, बैंकर्स के पुरफ़रेब आदाद व शुमार

* 16.61 करोड़ रुपये की बमुश्किल तक़सीम और 12,124.31 करोड़ रुपये वसूल तलब, बैंकर्स के पुरफ़रेब आदाद व शुमार
हैदराबाद। (सियासत न्यूज़) सियासी और मिली क़ियादत को मुस्लिम मस्लों का हक़ीक़ी एहसास‌ ना होने और मस्लों के बारे में सतही दिलचस्पी के सबब‌ आंधरा प्रदेश के मुस्लिम अपने हुक़ूक़ पाने से महरूम होते जा रहे हैं। अपने हुक़ूक़ पाने संजीदा कोशिशें ना किए जाने की वजह से रियासत के बैंकर्स आदाद और शुमार का उलट फेर करते हुए ना सिर्फ मुस‌लमानों बल्कि हुकूमत को भी गुमराह कर रहे हैं। उसे आंधराप्रदेश के मुसलमानों के अलमीया पर महमूल किया जाए कि उन्हें बैंकों से कर्जें तो हासिल नहीं होरहे हैं मगर उन की वाजिबात में बढावा ही होता जा रहा है।

बैंकर्स कमेटी कि मिटींग‌ में पेश की जाने वाले दस्तावेजों की रो से पिछ्ले माली साल में रियासत के बैंकर्स ने तरजीही विभाग‌ के तहत 73,316 करोड़ रुपये के कर्जें देने का निशाना तय‌ किया था और निशाने से 7.45 फीसद जयादा तक़सीम करते हुए 78,776 करोड़ रुपये के क़र्जें तक़सीम किए।

प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की खास‌ दिलचस्पी के सबब‌ रिज़र्व बैंक आफ़ इंडिया के मुल्क भर के तमाम बैंकर्स के लिए जारी किये गए रहनुमा ख़ुतूत के मुताबिक़ तरजीही विभाग‌ में दीए जाने वाले कर्जों में अक़ल्लीयतों(अल्पसंख्यकों) के लिए 15 फीसद खास‌ होना चाहीए। इस एतबार‌ से अक़ल्लीयतों में पिछले साल तय किये गए निशाने के एतबार‌ से 10,997.4 करोड़ रुपये और तक़सीम किये गए कर्जों के एतबार से 11,816.4 करोड़ रुपयें तक़सीम किए जाने चाहीए मगर कोई भी नहीं जानता कि पिछ्ले साल बैंकों ने अक़ल्लीयतों में हक़ीक़त में कितने करोड़ रुपयें के कर्जें तक़सीम किए हैं।

स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी आफ़ आंधरा प्रदेश की चीफ मिनिस्टर मिस्टर एन किरण कुमार रेड्डी के क़ियादत में आज हुइ 178 वीं मिटिंग‌ में पेश किये गए दस्तावेजों में किए गए पुर फ़रेब दावों बल्कि धांदली के सबब‌ यही असर उभरेगा कि अक़ल्लीयतों में 12,124.31 करोड़ रुपये के क़र्जें तक़सीम किए गए हैं मगर कहा जाता है कि झूटे का हाफ़िज़ा कमज़ोर होता है और धोका बाज़ कहीं ना कहीं ग़लती कर ही जाता है।

दस्तावेज तैयार करने वालों से भी एक ग़लती होगई चूँकि पिछ्ले साल की कारकर्दगी पर पेश किये गए दस्तावेज़ के सफ़ा नंबर 62 पर ये दावा किया गया कि /31 मार्च 2012 के मुताबिक़ अल्पसंख्यकों को तरजीही विभाग‌ के तहत क़र्ज़ देने 12,124.31 करोड़ रुपये रही है जो तरजीही विभाग‌ की पेशगियों का 6.75 फीसद होता है। इसी पैराग्राफ में ये वज़ाहत करदी गई कि दीए गए आदाद शुमार /31 मार्च 2012 के मुताबिक़ तमाम अल्पसंख्यकों को दिये गये कर्ज‌ के बारे में वाजिबात हैं।

पहले तो ये मान लिया जाए कि बैंकों ने पिछ्ले बरस माइनारीटिज‌ को 12,124.31 करोड़ रुपयें तक़सीम किए हैं तो ये पिछ्ले बरस तक़सीम कि गइ 78,776 करोड़ रुपयें का 15.3 फीसद होता है और 73,316 करोड़ रुपयें का 16.5 फीसद होता है ना कि 6.75 फीसद। इस तरह बैंकों का झूट साबित होजाता है। रही बात पिछ्ले साल माइनारीटीज‌ में हक़ीक़त कितने करोड़ रुपयें तक़सीम किए गए इस का जिक्र कहीं नहीं किया गया ।

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