Wednesday , August 16 2017
Home / Islamic / मालेगांव शहर में पिछले 40 सालों से चल रहा है शरिया अदालत, लोग फैसले से हैं संतुष्ट

मालेगांव शहर में पिछले 40 सालों से चल रहा है शरिया अदालत, लोग फैसले से हैं संतुष्ट

मालेगांव: देश में शरीअत में हस्तक्षेप और शरई अदालतों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिशें की जा रही हैं। जबकि देश भर में शरिया अदालत बहुत सलीके से और शरीअत के दायरे में रहते हुए चलाए जा रहे हैं। महारष्ट्र के मालेगांव शहर में चालीस साल पहले मरहूम मौलाना अब्दुल हमीद मिल्ली ने शरिया अदालत स्थापित किया था।

Facebook पे हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करिये

न्यूज़ नेटवर्क समूह प्रदेश 18 के अनुसार इस अदालत में अब तक 2600 से अधिक मामलों के फैसले सुनाए जा चुके हैं और आज भी काम जारी है।
शरिया अदालत में तलाक, खुला और हलाला के अलावा शरई मामलों का भी निपटारा किया जाता है। पक्षों की मर्जी से दाखिल की गई मामलों के फ़ैसले कुछ महीनों में ही सबूत की जांच करके सुना दिए जाते हैं, जिस से आज तक जितने लोग इस अदालत में आये सभी फ़ैसले से संतुष्ट हैं।

मालेगांव शहर में शरिया अदालत की स्थापना 3 जून 1973 को हुई थी। जब मुस्लिम पर्सनल लॉ के खिलाफ आवाज उठने लगी और आलोचना होने लगी। तब देश के उलेमा की 1972 में मुंबई में एक कनवोनशन का आयोजन किया गया, जिसमें यह तय पाया कि शरीअत पर रजाकाराना तौर पर काम किए जाने की जरूरत है।

इसके लिए हर ऐसे शहर में रजा काराना रूप से चलाया जाए, जिसका फायदा मुसलमानों को पहुंचे। इन दिनों मशहूर आलिमे दीन मरहूम मौलाना अब्दुल हमीद मिल्ली नोमानी ने यह फैसला किया है कि शहर में दारुलकज़ा का गठन होगा। मेहदे मिल्लत के शिक्षक मौलाना अहमद अज़हरी को प्रशिक्षण के लिए पटना भेजा गया और फिर 1973 से मालेगांव शहर में शरिया अदालत अपनी सेवा अंजाम दे रहा है।मालेगांव शहर के दारुलक़ज़ा से लोग काफी संतुष्ट हैं और उन्हें शरीअत के अनुसार यहां से फैसले सुनाए जा रहे हैं।

दारुलकज़ा मालेगांव के सभी शरिया अदालतों में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। महाराष्ट्र के किसी स्थानीय शरिया अदालत में फैसला होने के बाद अगर कोई आपत्ति हो तो इस अदालत में अपील दाखिल की जा सकती है।

शरिया अदालत पर सरकारी अदालतों के बराबर काम करने का आरोप सरासर गलत है। शरिया अदालत में मुकदमा तब दायर किया जाता है, जब पक्षों की मर्जी हो और उन्हें मामलों को सम्मिलित किया जाता है, जो मुस्लिम पर्सनल लॉ के दायरे में आते हैं. साथ ही उन्होंने साथ सरकारी अदालत के किसी भी फैसले पर अपनी राय देने से परहेज़ किया है।

TOPPOPULARRECENT