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मिलिए कुछ गैर-मुस्लिमों से जो सालों से रोजे रखकर मिटा रहे मजहबी फर्क

Photo Courtesy: BBC

भारत देश हमेशा से ही ऐसे देशों में शामिल रहा है जहाँ के लोग अलग-अलग मजहबों का सम्मान करते हैं और एक-दूसरे के त्यौहारों में शामिल होकर खुशियां मनाते हैं।
रमजान के पाक  महीने में जहाँ मुसलमान रोजा रखते  है और आम तौर पर रोजे का जिक्र आने पर किसी मुस्लिम शख्स की छवि जहन में आती है। वहीँ रोजा रखने वालों में गैर-मुस्लिम भी होते हैं। 

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आइए आपको मिलाएं रोजा रखने वाले ऐसे ही कुछ गैर-मुसलमान लोगों से। जिनमें से एक शख्स खुद के नास्तिक होने का दावा भी करता हैं।
1. अमरेंद्र बागी

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पटना के रहने वाले अमरेंद्र बागी पिछले 20 सालों से रमजान के महीने में रोजा रखते आ रहे हैं। पेशे से वकील और बीजेपी नेता अमरेंद्र पहले नास्तिक थे। वह बताते हैं कि  नब्बे के दशक में जब उनके छोटे भाई बीमार पड़े तो इलाज के सिलसिले में उन्हें एक सूफी-संत के पास जाना पड़ा था और इस  सूफी-संत के दरबार में जाने के बाद वे सभी धर्मों के त्यौहारों में शामिल होने लगे। रोजा रखना भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है। जेपी आंदोलन से जुड़े रहे बागी बताते हैं कि समाज में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के मकसद से मैं रोजा रखता हूं। देश में हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई अगर मिलकर एक दूसरे के त्यौहार मनाएं तो आपस में किसी तरह का मतभेद होना ही मुमकिन नहीं हैं।

2. प्रभात जोसफ ठाकुर

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पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रहने वाले प्रभात जोसेफ ठाकुर ईसाई हैं और पेशे से रियल स्टेट बिजनेसमैन हैं। प्रभात का कहना हैं कि जब उनके मुस्लिम दोस्तों ने बताया कि रोजा रखने से शांति मिलती है, मन में अच्छे विचार आते हैं और शरीर भी तंदुरुस्त रहता है तो दोस्तों से प्रेरित होकर उन्होंने भी रोजा रखना शुरू कर दिया लेकिन प्रभात बताते हैं कि उनका रोजा रखने का अपना तरीका है। वह सहरी और इफ्तार के समय कुरान की जगह बाइबिल पढ़ते हैं।

3. मेघनाथ

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सोशल एक्टिविस्ट और डाक्युमेंट्री के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीत चुके मेघनाथ कहते तो यह हैं कि वह नास्तिक हैं, लेकिन रमजान के महीने में रोजा रखते हैं। मेघनाथ बताते हैं कि 1989 के रमजान के महीने में जब वह जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में एक फिल्म की एडिटिंग कर रहे थे। तब शाम के वक्त उनके आस-पास कई लोग इफ्तार करने के लिए बैठते थे। रांची में रहने वाले मेघनाथ का कहना है कि उन्हें उनके पिताजी की बचपन में कही बातें आज भी याद है। उनके पिताजी कहते थे कि हज जाने के पहले सारा उधार उतारना पड़ता है, दिल से दुश्मनी साफ करनी पड़ती थी। मैंने बचपन में  इस्लाम के बारे में जो थोड़ा-बहुत मैंने सीखा था जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में जाकर इस्लाम को और गहराई से जाना  और फिर इस्लाम को समझने की कोशिश में मैं रोजा रखने लगा।

4. प्रोफेसर सच्चिदानंद सिंह साथी

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पटना यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर सच्चिदानंद सिंह साथी  83 साल की उम्र के हैं और वह 1985 से रोजा रखते आ रहे हैं लेकिन सिर्फ एक दिन रमजान के अंतिम जुमे को रोजा रखते हैं।  प्रोफेसर सच्चिदानंद रोजा रखने की शुरुआत के बारे में बताते हैं कि उन्हें एक दोस्त ने 1984 में कुरान तोहफे में दी थी।  इसके बाद एक दोस्त जब हज कर के लौटे तो वहां से मेरे लिए टोपी लेआए। जिसके बाद से ही मेरे मन में रोजा रखने का भाव जगा। मैं रोजा रख रहा हूं और लोग भी मुझे प्रोत्साहित करते हैं।

Photo Courtesy: BBC

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