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गुजरात के कनुभाई जो ज़ात से हैं दलित हिन्दू पर पेशा गाय की खाल निकालना

गुजरात के कनुभाई जिसकी दिन की शुरुवात गाय की मौत की जानकारी से शुरू होती है. पास में ही मृत गाय का चमड़ा निकालने का काम करते हैं. 20 सालों से ये काम कर रहा हैं.

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इनके दादा परदादा भी यही काम करते थे. इसलिए ये कहना सही होगा कि ये काम उन्हें विरासत में मिला. वे पढ़े लिखे नहीं हैं. इस काम की शुरुआत 15-20 साल पहले उन्होने अपने पिताजी के साथ की थी. पहले इस काम में उनका मन नहीं लगता था. शव से बहुत दुर्गंध आती थी.इस काम का सारा तरीका उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था. लेकिन क्या करें. उनके पास कोई चारा नहीं था. जब मैं वो दूसरी क्लास में था तभी उनके पिताजी ने कहा कि ये हमारा पारंपरिक काम है और तुम्हें वही करना चाहिए. इस वजह से वे पढ़ाई भी नहीं कर पाया. उनके मन में ये सोच भी बैठी थी कि अगर वो कोई दूसरा काम करना भी चाहूं तो क्या ‘दलित’ होने की वजह से समाज उन्हें कोई और काम करने नहीं देगा.

वो इस काम को लेकर कोई खास उत्साहित नहीं हैं. जिस तरह चार लड़कों को पीटा गया है, इससे उन्हें इतना डर हो गया है की अब इस काम को नहीं करेंगे. उनके मुताबिक गाय हमारा भी माता ही हैं. घर वाले कहते हैं कि इस काम को अब मत करो और मज़दूरी करो.

इस घटना से घर के लोगों में डर बैठ गया है. रोज़गार के लिए वो कहीं भी जा सकते हैं – गांव छोड़ सकते हैं, मुंबई, दिल्ली कहीं भी जा सकते हैं. लेकिन इन सबके बावजदू कनूभाई कभी भी अपना मजहब बदलने की बात नहीं सोची.

(साभार : बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम)

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