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मिस्र का जासूस जिसने इस्राइल को बचाया

मिस्र-सीरिया और इज्राइल के बीच 1973 में हुए युद्ध के चालिस साल बाद इज्राइली लेखक उरी बार-जोसेफ की किताब ने अरब-इज्राइल संघर्ष के जासूसी मामलों पर बहस छेड़ दिया है। बार-जोसेफ ने अपनी इस किताब में योम किप्पूर युद्ध में एक बहुत वरिष्ठ और महत्वपूर्ण मिस्री जासूस के बारे में लिखा है। मिस्री जासूस अशरफ मार्वान की मौत 2007 में लंदन के एक अपार्टमेंट में रहस्य तरीके से गिरने के की वजह हुई थी। पर उसके गिरने की मुख्य वजह क्या थी यह भी रहस्य है।1973 के युद्ध में मार्वान वो व्यक्ति था जिसके कारण इज्राराइल से अरब हार गए। बार-जोसेफ की किताब से इस बात को और भी बल मिलता है कि मार्वान अपने कौम का गद्दार था और उसने युद्ध के दौरान देश की खुफिया सूचनाओं को इज्राइल हाथों बेचा जिसके कारण मिस्र और सीरिया को यह युद्ध हारना पड़ा। वो मोसाद का एक हीरो था और इज्राइल के लिए एक बेशकीमती खुफिया संपत्ति।

मार्वान का कोड नेम ‘एन्जल’ था। मिस्र इज्राइल पर हमला करने वाला था उसके ठीक 24 घंटे पहले मार्वान से इसकी जानकारी इज्राइल को पहुंचा दी। बार-जोसेफ ने अपने इस किताब में उस दशक के जासूस व्यवस्था पर काफी कुछ लिखा है और खासतौर से मार्वान के समबंध में। मार्वान महीने में एक या दो जानकारी पहुंचाने के लिए 50,000 डॉलर से 100,000 डॉलर मिलता था इसके अलावा उपहार और बोनस अलग से। वह हमले की जानकारी ठीक 24 घंटे पहले क्यों दिया। हालांकि वह इसकी जानकारी उसके पहले भी दे सकता था?

बार-जोसेफ कहते हैं कि मार्वान की विशुद्ध हत्या की गई, वरना इस बात की जानकारी किसको थी कि वह उस समय लंदन में है। युद्ध की जानकारी देने के बाद उसने घबरा कर मोसाद के चीफ से मिलने के लिए एक कॉल किया था। उन्होंने इस बात का भी पर्दाफाश किया है कि मार्वान एक डबल एजेंट था, जिसने युद्ध के ठीक 24 घंटे पहले इज्राइल को सुचना दिया, जबकि वह ऐसा पहले भी कर सकता था। लेखक का तर्क है कि मिस्र की खुफिया विभाग ने मार्वान का उपयोग नहीं किया, यह उनकी नाकामी थी, हालांकि वह जमाल अब्देल नासिर का दामाद कौन था।

उन्होंने यह भी तर्क दिया है कि मिस्र के खुफिया सेवा अनुभवहीन था और वह पश्चिमी खुफिया एजेंसियों की तरह डबल एजेंड वाला आपरेशन चलाने में असमर्थ था। इज्राराइल को मालूम था कि युद्ध उसके सर पर था। इज्राराइली खुफिया विभाग यह भी जानता था कि मिस्र की सैन्य क्षमता पूरे सिनाई को वापस लेने की ताकत नहीं रखता है। सेना के अनवर सादात को मार्वन की जासूसी के विषय में स्पष्ट तौर पर पता था पर उसने मिस्री सेना के आग इज्राराइली सैन्य क्षमता को कमतर और कमजोर करके आंका।

बार-जोसेफ का मानना है कि युद्ध में इज्राइली खुफिया विभाग विफल हो सकती थी। उसने पहले ही अपने दिमाग में एक खाका बना रखा था कि मिस्र इज्राइल पर हमला करेगा। सैन्य खुफिया प्रमुख मेजर जनरल एली ज़ेरा और मोसाद के निर्देशक ज़वी ज़ामीर के बीच टकराव था। मेजर जनरल एली को अपने संगठन पर अधिक भरोसा था और मार्वान की खुफिया क्षमता और विश्वासनियता पर संदेह था। जबकि ज़ामीर मार्वान के सुचनाओं पर विश्वास करता था। अशरफ मार्वान एक ऐसा जासूस था जिस पर विश्वास नहीं किया जाता था। वह नौजवान था और उसने जमाल अब्देल नासिर की बेटी से शादी की थी। वह राष्ट्रपति के ऑफिस में ही काम करता था।

सतही तौर पर इस बात का कोई प्रत्यक्ष जानकारी नहीं है कि उसने किन कारणों से देश की खुफिया जानकारी कट्टर दुश्मन इज्राइल को बेची थी। बार-जोसेफ ने मार्वान के ऐसा करने के पीछे की वजहों की प्रड़ताल करते हुए एक एतिहासिक और मनोवैज्ञानिक खाका खिंचा है। इसके लिए उन्होंने अरब नेताओं और रूस के बीच हुए सादात बैठक के तरफ इशारा किया है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि मार्वान को मिलने वाला ज्यादा नकदी उसे मनोवैज्ञानिक रूप इस जोखिम को उठाने लिए प्रेरित किया था। दूसरा कारण यह था कि वह अपने ससुर से प्रतिशोध लेना चाहता था, जो उस पर विश्वास नहीं करते थे।

मार्वान ने अपने जासूसी जीवन की शुरूआत लंदन (1970) में किया। वहीं उसने इज्राइल दूतावास से मिलकर मिस्र के शीर्ष रहस्यों को उसके हाथों बेचने का ऑफर दिया। हालांकि इस्रायलियों ने कुछ समय तक इस बात को सुनिश्चित करने के लिए लिया कि कहीं वह कोई डबल एजेंट तो नहीं। मगर जब उसने पुख़्ता जानकारी देनी शुरू कर दी तो वे उस पर विश्वास करने लगे। उसने 1998 तक लगभग 30 वर्षों तक इज्राइली के लिए जासूसी का काम किया। मार्वान ने बहुत-सी सूचनाएं दीं पर योम कीप्पूर युद्ध के बारे में दिया गया उसका यह सुचना इज्राइल के लिए सबसे महत्वपूर्ण था। युद्ध समाप्त होने के बाद मोसाद ने इसे एक लाख डॉलर की पेशगी राशि देकर पुरस्कृत किया। इस कार्य से उसने अपने ही देशवासियों को मौत के दलदल में धकेल दिया और दुश्मन इज्राराइलियों की जान बचा ली।

साभार: अल-जज़ीरा

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