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मिस्र में मज़ाहीया सयासी प्रोग्राम बाकूसमीडीया की आज़ादी का इज़हार!!

मिस्र में एक साल पहले बरपा (कायम) होने वाले इन्क़िलाब की कोख से सयासी और शहरी आज़ादियों को जन्म देने और उन्हें प्रवान चढ़ने का मौक़ा मिला वहीं मीडीया भी रियास्ती दबाओ से काफ़ी हद तक आज़ाद और बेखौफ हो कर मैदान में उतरा है। इस की एक ताज़ा मिस

मिस्र में एक साल पहले बरपा (कायम) होने वाले इन्क़िलाब की कोख से सयासी और शहरी आज़ादियों को जन्म देने और उन्हें प्रवान चढ़ने का मौक़ा मिला वहीं मीडीया भी रियास्ती दबाओ से काफ़ी हद तक आज़ाद और बेखौफ हो कर मैदान में उतरा है। इस की एक ताज़ा मिसाल यू टयूब पर मशहूर होने वाली एक वीडीयो फूटेज से लगाया जा सकता है, जिस में एक मज़ाह निगार ने अप्रैल 2011 को मिस्र के सदारती उम्मीदवार का तरबीह अंदाज़ में ख़ाका पेश किया है।

वीडीयो में मज़ाहीया किरदार अदा करने वाले फ़नकार मुहम्मद फ़ौज़ी उल-मारूफ़ बाकूस एक सदारती उम्मीदवार की हैसियत से क़ौम से ख़िताब (संबोधन) कर रहे हैं। इन के सामने टी वी चैनलों के माईक तो नहीं अलबत्ता उन्होंने मशरूबात के ख़ाली कीनज़ को माईक बना रखा है।

इस कामेडी क्लिप में बाकूस क़ौम से निहायत शुस्ता ( साफ) और सादा ज़बान में बात करते हुए क़ौम को क़ीमती खज़ाने से ताबीर कर रहे हैं। उलार बयाटी वी के क़ाहिरा से नशर होने वाले फ्लैगशिप प्रोग्राम सदारती मुक़ाबला में गुफ़्तगु करते हुए बाकूस ने अपने मज़ाहीया किरदारों पर बात करते हुए कहा कि इस तरह की वीडीयो उमूमन ( प्राय:/अक्सर) स्याह मज़ाह निगारी से ताल्लुक़ ( सबंध) रखती हैं, इस के नताइज ( नतीजे)ख़तरनाक भी हो सकते हैं ताहम उन्होंने मज़ाहीया अंदाज़ में सदारती उम्मीदवार का जो ख़ाका पेश किया है वो ज़राए इबलाग़ के दायरों के अंदर और नज़म वज़बत के उसूलों के मुताबिक़ है।

उन्होंने इन्किशाफ़ (इकरार) किया कि सियासत में मज़ाहीया फ़न कारी का सिलसिला साबिक़ सदर हसनी मुबारक के दौर से शुरू किया बल्कि यूं कहा जाय तो बेजा ना होगा कि मज़ाहीया सयासी तन्क़ीद पर उभारने वाली शख़्सियात में साबिक़ सदर हसनी मुबारक ख़ुद भी शामिल हैं, मैं उनके दौर में मज़ाहीया तहरीरें लिखता रहा हूँ लेकिन किसी किस्म का मुवाख़िज़ा नहीं हुआ। माबाद इन्क़िलाब मीडीया को मिलने वाली आज़ादी के बारे में इन का कहना था कि इन्क़िलाब ने ज़राए इबलाग़ के सामने खड़ी ख़ौफ़ की दीवार गिरा दी है और लोगों में तेज़ी के साथ सयासी शऊर फ़रोग़ पा रहा है।

इन्क़िलाब से पहले ज़राए इबलाग़ महिज़ (सिर्फ) रोज़ी रोटी के लिए अपना काम अंजाम देते थे लेकिन अब वो क़ौमी सियासत के बड़े बड़े मौज़ूआत पर सैर हासिल बात करने की सलाहीयत रखते हैं

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