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मुआशरा और अदम तहमुल

अब्दुल हमीद अंसारी, कोलकाता

आखिर अदम तहमुल (intolerance) पर पर बहस क्यो हो रही है, क्या इस देश के लोग भाजपा के मंशुबो से महरूम हैं? मै समझता हूँ कि बहस फिजूल की हो रही है,मगर समाज में जो लोग इंसानियत पसंद है, उनसे दूरी नही बनाना चाहिए।
एक दुसरे से बात – चीत का सिलसिला शुरू होना चाहिए, हम बात – चीत से एक दुसरे के करीब जा सकते हैं। चाहे वह किसी भी मजहब का हो, अपने बेहतरीन काम से सभी का दिल जीतना हमारा मकसद होना चाहिए।
इसमें कोई शक नहीं कि 2002 गुजरात के बाद मुसलमानों का नजरिया मोदी जी के लिए बेहतर नहीं था, मगर वज़ीरेआजम बन जाने के बाद वो इस नजरिए को बदल सकते थे, खुद को बदल कर अपनी नई पहचान कायम कर सकते थे, हमारे मुआशरे की सोच को बदल सकते थे। शायद ये बेहतर मौका था, मुसलमानों की सोच को बदलने का। वज़ीरेआजम बन जाने के बाद मुसलमानों में एक उम्मीद जरुर हुइ थी, मगर इनकी खामोशी ने सब कुछ बदल कर रख दिया। अगर ये योगी आदित्य नाथ, साझी महाराज, साध्वी जैसे लोगों के बयानों पर सख्ती बरतते, तो आज शायद अखलाक जैसा बेगुनाह नहीं मारा जाता।
शायद इस बहस कि जरूरत ही नहीं पड़ती, उनकी खामोशी तो टुटी मगर देर से।
मगर जो लोग इस मुआशरे में अदम तहमुल महसूस कर रहे हैं, उनको घबराने की जरूरत नहीं है। हर मसायल को बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है, अगर आप गौर से देखें तो सिर्फ 8% वोट ने उनके फैसले में अहम किरदार अदा किया है, 25 % वोट उनका हमेशा से साथ रहा है।
ये 8% वो लोग हैं, जो समाज मे बदलाव देखना चाहते थे, शायद इस बदलाव की उनको भी उम्मीद नहीं रही होगी, जो आज बहस का सबब बना हुआ है। क्या मालूम शायद ये लोग उनके साथ दोबारा न जायें।
हा मगर मै इस देश के मुसलमानों से जरूर अपिल करूंगा कि वह अपने अच्छे कामों से मुआशरे में अपनी नई पहचान कायम करे, जो अच्छाइयाँ आप में है, उसे समाज में रखे।
इस देश की आजादी में हम मुसलमानों का काफी अहम रोल रहा है, अगर आप रेशमी रूमाल तहरीक को पढ़ेंगे तो आप समझ सकेंगें की आपकी अहमियत क्या है ,इस देश मे ऐसे लोग हम पर उंगली ना उठाये , जिनका आजादी की लड़ाई में कोइ किरदार नहीं है।
मै समझता हूँ कि उनको जवाब देने की जरूरत बिल्कुल ही नहीं है। बेहतर है कि आप अपने बेहतरीन कामो से समाज को मजबूत करने का काम करे।समाज में ज्यादा से ज्यादा मुजाकरात पर जोर दिया जाये।

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