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मुख्यमंत्री को जनता की चिंता नहीं, विकास क्या होता है पता नहीं, मोदी का भाषण

पश्चिम बंगाल:प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में चुनाव अभियान चलाते हुए कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन की आलोचना की और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर आरोप लगाया किया कि उन्होंने (दोनों पार्टियों कांग्रेस और वामपंथी दलों ने) समझौता कर लिया है। इन दोनों दलों के साथ ममता बनर्जी ने साठगांठ कर लिया है और राज्य को नष्ट कर दिया जा रहा है। राज्य में एक अप्रैल को होने वाली दूसरे चरण की वोटिंग से पहले एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए मोदी ने ममता बनर्जी और वामपंथी दोनों पर आरोप लगाया  कि उन्हें बंगाल के विकास व कल्याण या भविष्य में दिलचस्पी नहीं है।

उन्होंने जनता से अपील की कि वह तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से ऊपरी मन करते हुए भाजपा को एक मौक़ा दें और राज्य में विकास की गति को देखें। पश्चिम बंगाल के गौरवशाली अतीत और उज्जवल इतिहास का हवाला देते हुए मोदी ने कहा कि आज़ादी के बाद कांग्रेस, वामपंथी और अब दीदी (ममता) ने बंगाल को नष्ट कर दिया है। ये पार्टियां अपने भाग्य के रक्षक नहीं हैं, उन्हें विकास की चिंता नहीं है|और न ही यह पार्टियां विकास चाहती हैं।

वामपंथी और दीदी मिलकर बलात्कार, भ्रष्टाचार, हिंसा में एक दूसरे पर आरोप कर‌ रहे हैं बल्कि यह आरोप-प्रत्यारोप का खेल केवल एक दिखावा है। इन शक्तियों से पश्चिम बंगाल को कौन बचाएगा? बंगाल ने अच्छे और बुरे दोनों चेहरों को देखा है। बंगाल की सरकार में जो लोग बुरे हैं उन्हें घर में बैठा दिया जाए।

कांग्रेस और वामपंथी दलों ने गठबंधन किया है ताकि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव लड़ सकें और सत्तारूढ़ तृणमूल से सत्ता हासिल कर लें। मोदी ने ममता बनर्जी की आलोचना की कि उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में उनकी ओर से मांगी गई बैठक में शिरकत नहीं की। लेकिन दिल्ली में उन्होंने (दीदी) कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की।

यह एक ऐसी मुख्यमंत्री हैं जो मानते हैं कि प्रधानमंत्री से मुलाकात करने के लिए दिल्ली नहीं जाएंगी लेकिन उन्होंने सोनिया गांधी से मुलाकात के लिए मत भूलना। हम ऐसे संबंध को समझ नहीं सकते। यहां कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन है लेकिन जब दीदी दिल्ली जाती हैं तो वह सोनिया गांधी का आशीर्वाद जरूर लेती हैं। दोनों नेताओं मुस्कुराते हुए चेहरों के साथ तस्वीरें लेते हैं। अंत ममता बनर्जी कैसे मुख्यमंत्री हैं। राज्य में विकास की चिंता करने के बहाने केंद्र से राज्य मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय महत्वपूर्ण बैठकों का बहिष्कार करती हैं।

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