Wednesday , September 27 2017
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मुझे सहल हो गई मंजिलें वो हवा के रुख भी बदल गए…

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मुझे सहल हो गई मंजिलें वो हवा के रुख भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ मे आ गया की चिराग राह मे जल गए

वो लजाए मेरे सवाल पर की उठा सके न झुका के सर
उड़ी जुल्फ चेहेरे पे इस तरह की शबों के राज मचल गए

वही बात जो न वो कर सके मेरे शे”रो –नग्मा मे आ गई
वही लब न मै जिन्हें छु सका कदहे-शराब मे ढल गए

उन्हें कब के रास भी आ चुके तेरी बज्मे-नाज़ के हादीसे
अब उठे की तेरी नज़र फिरे जो गिरे थे गिर के संभल गए

मेरे काम आ गई आखरिश यही काविशें यही गर्दिशे
बढ़ी इस कदर मेरी मंजिलें की कदम खार निकल गए .

(“मजरूह” सुल्तानपुरी )

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