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मुसलमानों के किरदार को आम करना ज़रूरी

मुल्क की आज़ादी में मुसलमानों ने जो किरदार निभाई है इसे आम करने की सख्त ज़रूरत ही ताकि मतलब परस्त लोगों के दिलों में जंगे आज़ादी में ओलमाए किराम की खिदमात और मुसलमानों की कुर्बानियों का एहसास ज़िंदा हो सके। ये बातें तहरीक इंसाफ काउंस

मुल्क की आज़ादी में मुसलमानों ने जो किरदार निभाई है इसे आम करने की सख्त ज़रूरत ही ताकि मतलब परस्त लोगों के दिलों में जंगे आज़ादी में ओलमाए किराम की खिदमात और मुसलमानों की कुर्बानियों का एहसास ज़िंदा हो सके। ये बातें तहरीक इंसाफ काउंसिल बिहार अलहिंद के क़ौमी सेक्रेटरी मौलाना शकील अहमद हाशमी ने एक प्रेस बयान में कहें।

उन्होने कहा की हिंदुस्तान में गैर मुस्लिम की कई तंजीमे ऐसी हैं जो मुसलमानों को लुभाने के लिए मुहब्बत के हजारों बोल बोलती है और आज के मुसलमान उनके मकसद को समझे बेगैर वैसी तंजीमो में घुलमिल जाते हैं जिसका खामियाजा आम ज़िंदगी बसर कर रहे मुसलमान भुगतने के लिए मजबूर हैं। अक्सर कम आबादी वाली जगह पर मजहबी लड़ाई छेड़ दी जाती है और मुसलमानों के जान व माल का पूरा पूरा नुकसान होता है और मुसलमान इंसाफ की फरियाद करते करते थक हार कर बैठ जाते है। अफसोस का मुकाम है की इस मुल्क में तमाम मजाहिब के लोग इंसाफ मांगने के लिए मजहब हक्का के मानने वाले मुसलमान के पास आया करते थे जब किसी इलाक़े से एक मुसलमान की गुज़र होती थी तो गैरों के माँ अपने रोते हुये बच्चों को चुप कराते और कहते चुप हो जा मुसलमान आ रहा है लेकिन आज हम मुसलमानों के अंदर गैरों का इतना खौफ तारी है की रात की तारीकी हो या दिन की रोशनी हम हक़ बात कहने से भी डरते हैं। एक मुसलमान पर ज़ुल्म होता देख कर भी हम खामोश एख्तियार किए रहते हैं।

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