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मुसलमानों के डर से नहीं बाढ़ के क़हर से हो रहा है पलायन

वोटों के सौदागर और हर बात पर हिन्दू-मुस्लिम में अलगाव लाने वाले हमारे देश के कुछ नेता आजकल अपने अच्छे अच्छे घरों में मज़े से बैठे हैं. ऐसा नहीं है ये लोग घर से निकलते नहीं हैं और कोई धरना प्रदर्शन नहीं करते, सब करते हैं लेकिन तब जब बात दलित-हिन्दू की हो या हिन्दू मुसलमान की हो और इस वक़्त मुद्दे ये सब नहीं हैं अमानवीय बाढ़ है. अब बाढ़ पे कोई क्यूँ बोलेगा, प्राक्रतिक आपदा है इसको तो ख़ुद ही झेलना पड़ेगा और एक दौर आएगा जब बाढ़ ख़त्म हो जायेगी तो वापिस गाँव पहुँच जाना ही है. हमारे देश के नेताओं की सबसे अमानवीय बात यही है, ये तब तक किसी मुद्दे पर बोलते नहीं हैं बात नहीं करते हैं जब तक उसमें उनका राजनितिक फ़ायदा ना हो.
ख़बर है कि बाराबंकी में 5000 से ज़्यादा लोगों ने पलायन किया है वहीँ नदियों ने अपना क़हर जारी रखा है और गंगा, वरुणा और घागरा जैसी पूर्वी उत्तर प्रदेश की नदियाँ उफ़ान पर हैं. देश के बाक़ी हिस्सों में भी बाढ़ का क़हर है और बाढ़ एक ऐसी चीज़ है जो हिन्दू-मुसलमान देख कर नहीं आती, बाढ़ बस आ जाती है और जब आ जाती है तो सारे बोरिया बिस्तर लेकर भागते हैं. खेतों में पानी भर गया है, गावों में भर गया है और लोगों की करोड़ों रूपये की संपत्ति का नुक़सान हो गया है लेकिन इस पर कोई राजनेता अपना पक्ष रखने को तय्यार नहीं है, वो लोग जो अपने को स्वंय सेवक कहते हैं वो इस दौर में ख़ुद की ही सेवा करने में लगे हैं. ऐसा नहीं है कि ये लोग कहीं चले गए हैं, अभी कोई दंगे फ़साद की बात हो तो ये फिर आयेंगे नज़र में और लोगों को बताएँगे कि ज़हर कैसे फैलाया जाता है. देश की ग़रीब किसान जनता के लिए ये दौर कितना भयानक है ये AC कमरों में बैठे लोग नहीं समझ सकते. हर एक रोज़, हर एक पल एक जंग की तरह है..उम्मीद की जाती है कि थोडा सा संघर्ष कर लिया गया तो जान बच जायेगी लेकिन जान का ख़तरा है. भूके बिलखते बच्चों को संभालना और उन्हें लेकर इधर से उधर, उधर से इधर जाना अपने आप में एक ऐसा संघर्ष है जिसे सिर्फ़ सोचा जा सकता है या फिर जिया जा सकता है..इसको दूर से महसूस करना मुमकिन ही नहीं है.
दु’आ करता हूँ कि बाढ़ का क़हर कुछ कम हो, लोग फिर से अपने गांवों में जा पायें और नेताओं के भेस में बैठे हुए असामाजिक तत्व को ये समझ आये कि इस पर काम करना भी ज़रूरी है.

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