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मुसलमानों को आपसी मतभेद भुलाने होंगे

मुसलमानों को फ़ुरूई इख़तिलाफ़ात फ़रामोश करते हुए मुत्तहिद होने की तलक़ीन
हैदराबाद 24 फ़रवरी: अस्वा नबी करीम सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ज़िंदगी के हर मरहले में हमारी रहनुमाई करती है। हालात के तक़ाजे के एतबार से हमें अस्वा इख़तियार करना चाहीए। हमें हुक्म है कि जब तुम्हारी मदभीड़ एसी जमात से हो जाएगी जो तुम्हारी शिनाख़्त पर डाका डाले तो उस के आगे जम जाओ और इस्तिक़ामत इख़तियार करो। अल्लाह को याद करो। नुसरत तुम्हारी ही होगी।

ईमान के बग़ैर जन्नत में दाख़िला मुम्किन नहीं और इसी तरह बाहमी मुहब्बत के बग़ैर ईमान मुकम्मिल नहीं। आज़माईशें उम्मत के लिए सबक़ होती हैं, मुस्लमान वतन को महबूब बना सकते हैं लेकिन माबूद नहीं बना सकते। क़लब को मुतमइन करते हुए हिक्मत-ए-अमली के साथ मुक़ाबले की क़ुव्वत पैदा करने की ज़रूरत है और ये क़ुव्वत अल्लाह से ताल्लुक़ को मज़बूत करते हुए हासिल की जा सकती है।

इन ख़्यालात का इज़हार सहि रोज़ा सीरत उन्नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम सेमीनार के आख़िरी दिन मुनाक़िदा मीटिंग आम बउनवान मुहसिन इन्सानियत सल्लललाहु अलैहि वसल्लमका पैग़ाम इन्सानियत के नाम से ख़िताब करते हुए मुल्क-ओ-बैरून-ए-मुल्क से आए उल्मा किराम ने अपने ख़िताब के दौरान किया।

मौलाना मुफ़्ती अशर्फ़ अली बाक़वी की ज़ेरे सदारत मुनाक़िदा इस मीटिंग में उम्मतुलमुस्लिमीन को इख़तिलाफ़ात के ख़ातमे के ज़रीये आपस में इत्तेहाद पैदा करने की तलक़ीन करते हुए उल्मा ने कहा कि बसाऔक़ात कुछ मुआमलात में इख़्तिलाफ़-ए-बाहमी दुश्मनी का सबब बन रहा है और दुश्मनी हराम है।

मौलाना ख़ालिद ग़ाज़ी पूरी नदवी ने अपने ख़िताब के दौरान उम्मते मुस्लिमा को सीरत तय्यबा (स०)के पहलू से वाक़िफ़ करवाते हुए कहा कि नबी अकरम(स०) की शान में गुस्ताख़ी करने वालों को बख़्शा नहीं गया। उन्होंने बताया कि हिक्मत-ए-अमली के ज़रीये इक़दाम की ज़रूरत है। उन्होंने अल्लाह और रसूल(स०) की इताअत को लाज़िमी कर लेने की तलक़ीन करते हुए कहा कि जब तक हम सीरत के आईना में अपनी ज़िंदगी को नहीं सँवारते, कामयाबी मुम्किन नहीं है।

मौलाना ने बताया कि किसी इंसान पर इतने मसाइब नहीं आए जितने नबी आखिरुज़्ज़मां हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लललाहु अलैहि वसल्लम पर आए हैं लेकिन नबी अकरम सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने कभी मायूसी का इज़हार नहीं किया और ना ही ख़ौफ़ज़दा हुए। मौलाना ख़लील उल रहमान सज्जाद ने उम्मते मुस्लिमा को मश्वरह दिया हैके वो ग़ुस्सा या ख़ौफ़ज़दा होने के बजाये हिम्मत से हालात का मुक़ाबला करें।

अल्लाह से ताल्लुक़ को मज़बूत करते हुए इतमीनान क़लब हासिल करें। उन्होंने कहा कि दुनिया में मुसलमानों पर उस वक़्त सख़्त तरीन हालात पैदा किए जा चुके हैं लेकिन उनके मुक़ाबले के लिए हमें ख़ौफ़ज़दा या ब्रहमी का इज़हार नहीं करना चाहीए बल्कि हिक्मत-ओ-हिम्मत से काम लेते हुए फ़ैसले करने चाहीए।

मौलाना ने वाज़िह तौर पर कहा कि नबी आखिरुज़्ज़मां सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने वतन से मुहब्बत का दरस दिया है। इसी लिए हम मुल्क से मुहब्बत करते हैं लेकिन कोई एसा तराना या वरज़िश के नाम पर की जाने वाली साज़िश का शिकार होते हुए हम महबूब को माबूद नहीं बना सकते।

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