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`मुसलमानों को क़ौमी सतह पर मज़बूत नुमाइंदगी की ज़रूरत’

हैदराबाद, 30 जनवरी- 'मुसलमानों को सियासी तौर पर बाशऊर करने के लिए क़ौमी सतह पर मज़बूत नुमाइंदगी की ज़रूरत है। आज पार्टियों कादौर नहीं रहा, इसलिए श़ख्सियतों के उभरने का दौर है। बड़े उलमा को चाहिए कि वो मुसलमानों की सियासी और तहज़ीबी

हैदराबाद, 30 जनवरी- ‘मुसलमानों को सियासी तौर पर बाशऊर करने के लिए क़ौमी सतह पर मज़बूत नुमाइंदगी की ज़रूरत है। आज पार्टियों कादौर नहीं रहा, इसलिए श़ख्सियतों के उभरने का दौर है। बड़े उलमा को चाहिए कि वो मुसलमानों की सियासी और तहज़ीबी नुमाइंदगी करें।’ इन ख़यालात का इज़हार मशहूर शायर मंजर भोपाली ने किया।

मंजर भोपाली हैदाराबाद यूनिवर्सिटी में मुऩाकिद एक मुशाएरे में हिस्सा लेने के लिए शहर आये थे। सियासत से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद मुसलमानों की नुमाइंदगी के लिए कोई बड़ी शख्सियत नहीं उभरी है। मुसलमानों में सियासी शऊर के फ़ुकदान के नतीजे में ही उनकी सही नुमाइंदगी नहीं की जा सकी।
मौजूदा सियासी हालात में मर्कज में मुस्त़कबिल के बारे में पूछे जाने पर उन्हेंने कहा कि यूपीए के खिलाफ आज भी कोई बड़ी त़ाकत नहीं उभर पायी है। बीजेपी या एनडीए को बहुत ज्यादा म़कबूलियत हासिल नहीं हो पायी है। इन हालात में मुसलानों को चाहिए कि अपने लिए पार्टी की बजाय श़ख्सियत को अहमियत देते हुए हिकमते अमली बनाएं।

मंज़र भोपाली ने कहा `मज़हबी जज़बात को भड़काने वाले बयानों से न मुसलमानों को कोई फायदा नहीं होगा। बल्कि उन्हें मजमूई तौर पर समाजी और सियासी ऩुकसान से दोचार होना पड़ सकता है। क्योंकि जब तोग़डिया के किसी बयान पर हम दूसरे हिन्दुओं के चहरे देखने लगते हैं, तो किसी मुसलामान की जानिब से दिये गये ऐसे बयान पर वो लोग भी मुसलामानों के चेहरे देखेंगे। दूसरे मज़हब के खिलाफ बोलना इस्लाम के खिलाफ है। इस बात का ध्यान सभी को रखना होगा।’
`गंगा तेरा पानी बदल देंगे.. ये मुल्ला पंडित और नेता.. पंडित को स्वर्ग में जाना है.. मुल्ला को जन्नत पाना है.. नेता को ख्वाब दिखाना है।’ जैसे गीत के शायर मंजर ने कहा दूसरे म़ज़हबी जज्बात को ठेस पहुंचाने वालों को हमदर्दी की निगाह से देखा नहीं जाता।

मंजर भोपाली शायरी के साथ-साथ राजनीति में भी काफी दिलचस्पी लेते रहे हैं। अवाम में सियासी शऊर बेदार करने पर ज़ोर देते हुए वो कहते हैं कि उन्हें सियासी मदारियों के जाल से बाहर निकालने की ज़रूरत है। मुल्क भर में आज मुशायरों से क़ौमी एकजहती और भाईचारे की बात की जा रही है और मुशाएरे सियासी मंचों से कही ज्यादा म़कबूल और असरदा हैं।

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