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मुसलमानों को कुछ सीखना है तो ब्रिटेन के मिक़दाद वर्सी से सीखें

लन्दन: पिछले साल ब्रिटेन के एक अख़बार ने जब इस्लाम और मुसलमानों से जुड़ी भ्रामक जानकारी छापी, तो ब्रिटिश नागरिक मिक़दाद वर्सी ने अख़बार को चुनौती दे दी. मिक़दाद का मानना है कि मीडिया में मुसलमानों से जुड़ी ग़लत रिपोर्टिंग आम हो गई है, लिहाज़ा अब वह मीडिया पर नज़र रखते हैं और भूल सुधार छापने का दबाव बनाते हैं.

मिक़दाद पूर्वी लंदन स्थित मुस्लिम काउंसिल के दफ़्तर में बैठते हैं. वह मुस्लिम काउंसिल के असिस्टेंट सेक्रेटरी जनरल हैं और ब्रिटिश मीडिया में मुसलमान और इस्लाम से जुड़ी हर ख़बर पर नज़र रखते हैं. मिक़दाद उनमें हुई ग़लतियों को ढूंढते हैं और भूल सुधार के लिए मीडिया कंपनी, प्रेस नियामक और मीडिया से जुड़ी तमाम संस्थाओं से शिकायत और आग्रह करते हैं.

मिक़दाद ने यह काम नवंबर में शुरू किया था और समय मिलने पर यह काम करते हैं. अभी तक वह 50 से ज़्यादा शिक़ायतें मीडिया कंपनियों से कर चुके हैं जिसकी उन्हें प्रतिक्रिया मिल रही है. सिर्फ दिसंबर में उन्होंने 8 ग़लतियां पकड़ी थीं और अभी तक जनवरी में वह चार भ्रामक सूचनाओं को चिन्हित कर चुके हैं.

मिक़दाद की शिक़ायतों पर ज़्यादातर मीडिया संस्थानों ने अपनी ग़लती मानने हुए भूल सुधार छापा है. ज़्यादातर मामले ऐसे हैं जहां ग़लत रिपोर्टिंग की वजह से किसी आम आदमी को शिकार होना पड़ा है. बीबीसी डर्बीशायर के एक प्रोग्राम में बात करते हुए मिक़दाद ने कहा, ‘यह काम कोई नहीं कर रहा था. कोई इन अख़बारों को चुनौती नहीं दे रहा था कि वह ग़लत ख़बरें छाप रहे हैं.’ संडे टाइम्स ने हाल ही में ऐसी एक ख़बर के लिए माफ़ीनामा छापा है और लेख में सुधार भी किया है.

मिक़दाद एक अन्य ख़बर का हवाला देते हैं, ‘मेल ऑन लाइन ने एक लेख में नेशनल यूनियन ऑफ स्टूडेंट्स की प्रेज़िडेंट पर आरोप लगाया था कि उन्होंने इस्लामिक स्टेट की निंदा करने से इनकार कर दिया है जो कि सरासर ग़लत खबर थी. उन्होंने खुलेआम इस्लामिक स्टेट की निंदा की थी’.

ज़्यादातर मीडिया कंपनियों को भेजी गई शिकायतों का नतीजा अभी तक पॉज़िटिव रहा है. बावजूद इसके मिक़दाद का मक़सद पूरा नहीं हो रहा है. वह कहते हैं, ‘कई बार भूल सुधार पढ़कर भी पता नहीं चलता कि अख़बार ने भूल सुधार छापा है और माफ़ीनामा तो आमतौर पर होता ही नहीं है. एक और ज़रूरी बात यह कि भ्रामक रिपोर्ट्स जहां ओवरप्ले की जाती हैं, वहीं भूल सुधार को डाउनप्ले कर दिया जाता है.

ज़ाहिद महमूद कांड

पिछले साल मेल ऑनलाइन की स्तंभरकार केटी होपकिन्स एक ब्रिटिश नागरिक ज़ाहिद महमूद और उनके भाई को चरमपंथी क़रार देते हुए उनके संबंध अल क़ायदा से जोड़ दिए थे. इसके बाद दोनों भाइयों को अमेरिका जाने वाले प्लेन पर नहीं बैठने दिया गया था. मगर इसके बाद ना सिर्फ़ अख़बार ने माफ़ी मांगी बल्कि दोनों भाइयों की छवि ख़राब करने की एवज में डेढ़ लाख पाउंड का जुर्माना भी भरा.

उत्तर पूर्वी लंदन स्थित घर में मौजूद महमूद करते हैं कि उन्होंने केटी होपकिन्स को माफ़़ कर दिया है. उन्होंने कहा कि उनके झूठे आरोपों से ज़्यादा तक़लीफ़देह लोगों की प्रतिक्रियाएं थीं. जब केटी ने लेख छापा तो सभी हमारे ख़िलाफ़ हो गए और जब केटी ने माफ़ीनामा छापा तो सभी उनके ख़िलाफ़ हो गए. बीच का कोई रास्ता ही नहीं है जैसे. यह सिर्फ़ केटी होपकिन्स का मामला नहीं है बल्कि आम लोगों की मानसिकता है कि वे कितनी आसानी से किसी के विरोध या किसी के पक्ष में जा खड़े होते हैं. महमूद कहते हैं कि लोगों की इस तरह की प्रतिक्रिया से समाज में दरार बढ़ रही है और वह चाहते हैं कि लोग किसी भी तरह आपस में जुड़े रहें. महमूद ने केटी होपकिन्स को अपने घर चाय और कॉफ़ी के लिए भी बुलाया.

महमूद कहते हैं, ‘हमारे मन में केटी के लिए कोई मैल नहीं है. हम चाहते हैं कि केटी भी यह बात समझें कि जितनी ब्रिटिश वो हैं, उतने ही हम भी हैं.’ सच तो यह है कि मेरी बीवी के दादा और परदादा दोनों पहले और दूसरे विश्व युद्ध में लड़ चुके हैं. उन्होंने इस मुल्क़ की आज़ादी की लड़ाई लड़ी है.

मिक़दाद चाहते हैं कि ब्रिटेन में रह रहे समुदायों के बीच संबंध मज़बूत हों. वह कहते हैं कि ग़लत रिपोर्टिंग का असर बहुत भयावह होता है. एक समुदाय से जुड़ी नकारात्मक ख़बरें वायरल हो जाती हैं जबकि भूल सुधार के साथ ऐसा नहीं होता.

स्पाइक्ड ऑनलाइन के डिप्टी एडिटर टॉम स्लेटर कहते हैं कि मिक़दाद की शिक़ायतों से रिपोर्टरों में एक डर पैदा हो सकता है.

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