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मुसलमानों को गांव से बाहर निकलने की आज़ादी नहीं

कोलकता 10 जून: मग़रिबी बंगाल के एक टाउन में मुसलमानों को बाहर निकलने की आज़ादी नहीं है उन्हें आज़ादी के बाद से 3 किलोमीटर के हदूद तक ही महिदूद रखा गया है।

कोलकता 10 जून: मग़रिबी बंगाल के एक टाउन में मुसलमानों को बाहर निकलने की आज़ादी नहीं है उन्हें आज़ादी के बाद से 3 किलोमीटर के हदूद तक ही महिदूद रखा गया है।

दोनों तरफ एनक्लेव के बाशिंदे सिर्फ़ शनाख़्त ही नहीं 65 बरसों से बिजली पानी और बुनियादी सहूलयात से भी महरूम हैं।

मग़रिबी बंगाल के इस ख़ूबसूरत छोटे से गांव के बाशिंदे किसी मुल्क के शहरी नहीं हैं और ना ही उनकी कोई शनाख़्त है। उन्हें इस गांव से बाहर निकलने की भी आज़ादी नहीं है और इस गांव के लोग पिछ्ले 65 साल से इस गांव के एक पिंजरे में क़ैद हैं।

गांव के एक फ़र्द शाह जमाल कहते हैं ये एक चिड़ियाघर है हम जानवरों की तरफ़ हैं और ये दुनिया का सब से बड़ा चिड़ियाघर है।

हमें तो बाहर निकलने की इजाज़त नहीं लेकिन हमें बाहर से लोग देखने आते हैं। 1947 में तकसीम-ए-हिंद के वक़्त बंगाल की तक़सीम इस तरह हुई कि सौ से ज़्यादा गांव किसी भी मुल्क का हिस्सा ना बन सके।

इस गावें को सियत महल या एनक्लेव का नाम दिया गया। सियत महल के एक बाशिंदे जमशेद अली ने बताया कि हुकूमत उसे एनक्लेव कहती है और हम भी उसे एनक्लेव ही कहते हैं।

हम किस मुल्क के शहरी हैं हमें नहीं मालूम हमारी कोई शनाख़्त नहीं है। हिन्दुस्तान और बंगला देश की सरहद के दोनों तरफ वाक़्ये एनक्लेव के बाशिंदे सिर्फ़ शनाख़्त ही नहीं 65 बरसों से बिजली पानी-ओ-बुनियादी सहूलयात से महरूम हैं।

मशाल डनगा गावें के अबुलहसन कहते हैं यहां ना रोड है और ना रास्ते हैं दवावें से भी हम महरूम हैं और मुसीबत चाहे कैसी हो किसी की मदद हासिल नहीं है।

बंगाल की एक मुक़ामी कारकुन दीप्ति मान सेन गुप्ता बरसों से उन बाशिंदों के हुक़ूक़ के लिए काम करती रही हैं। वो कहती हैंके इन गावें वालों की ज़िंदगी ग़ुर्बत में गुज़रती है।

उनका कहना था उनकी सूरत-ए-हाल इंतिहाई गैर इंसानी है। हम बरसों से उनके लिए जद्द-ओ-जहद कर के दिखा चुके हैं और अब अगर ये मसला हल नहीं हुआ तो हम बैन-उल-अक़वामी अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे।

सियतमहल के बाशिंदे अपनी शनाख़्त और क़ौमियत के हुसूल के लिए 65 साल से जद्द-ओ-जहद कर रहे हैं।

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