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मुसलमानों को सब्र-ओ-सुकून का दामन न छोड़ने की मश्वर:

नई दिल्ली 17 जुलाई : रमज़ान उल-मुबारक का मुक़द्दस महीना शुरू हुआ, होना तो ये चाहिए था कि बिरादरान वतन का मुफ़सिद और शर पसंदाना टोला एहतिराम मज़ाहिब के पेशे नज़र इस महीने के एहतराम‌ का ख़्याल रखते हुए अपनी नफरत‌ और फ़ित्ना पर्वरियों से बाज़ आजाता।

देवबंद की पुरसुकून फ़िज़ा को बिगाडने टोंक में नमाज़ियों की पिटाई करने, फ़तह पूरी मस्जिद में क़ुरआन-ए-करीम के औराक़ को नजासत से आलूदा करके फेंकने, तब्लीग़ी जमात के अफ़राद से हाथापाई, लाडिस्पीक‌र की आवाज़ को कम-ओ-तेज़ करने, अइम्मा को जोद‌-ओ-कूब करने और इस जैसे नाजाने कितने उनवानात अख़बारी सफ़हात पर रोज़ाना हम देखते हैं।

फ़िर्कापरस्ती के कैंसर ने हुकूमत के तमाम इदारों को घेर लिया है। इंतिख़ाबात का वक़्त जूं जूं क़रीब आरहा है फ़िर्कापरस्त ताक़तें अपने पैर फैला रही हैं और जगह जगह फ़िज़ा को बिगाडाने और फ़सादाद को भड़काने में जद्द-ओ-जहद कररही हैं। ज़िम्मेदार हुकूमत इन फितनौ को दबाने के बजाय मुसलमानों को अपने भारी भरकम वादों से रिझाने की कोशिश कररही है

भोला भाला मुस्लमान उनके जाल में फंस सके और तक़रीबन 62 साल से जिस तरह इस को नीचा किया जाता रहा है अब भी उसे बेवक़ूफ़ बनाया जा सके। इन ख़्यालात का इज़हार मर्कज़ी जमईता उल्मा हिंद के जनरल सेक्रेटरी मौलाना अज़ीज़ अहमद क़ासिमी ने किया।

उन्हों ने कहा कि एक तरफ़ मज़कूरा बातें हैं और दूसरी जानिब मोदी की यौमिया ज़हर अफ़्शानी का मुआमला भी है, आए दिन कोई ना कोई इस का दिल आज़ार बयान आता रहता है। लेकिन हमें सब्र-ओ-सुकून का दामन हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए, क़ुदरत की लाठी में आवाज़ नहीं है और वो ज़रा सी देर में ऐसा बदला ले लेता है कि अहल बसीरत इबरत हासिल करलेते हैं। उन्होंने तलक़ीन की कि इत्तिहाद व सालमिय‌त का शीराज़ा मुंतशिर न होने पाए।

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