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मुसलमान जिन्हें आतंकवादी बना देना बेहद आसान है

आतंकवाद की दुनिया सपाट भले दिखती है मगर होती नहीं। यहां असली आतंकवादी कौन है, और आतंकवाद का इल्ज़ाम किस पर गढ़ दिया गया है, यह तस्वीर साफ़ होने में सालों बीत जाते हैं। जो समाज और मीडिया पहले दिन आंख बंद कर उन्हें आतंकी मान लेता है, वो रिहा होने पर यह ख़बर भी नहीं दिखाता कि फलां के साथ 20 साल पहले पुलिस या व्यवस्था ने कितनी नाइंसाफी की थी।

दिल्ली के सामान्य से ड्राइवर इरशाद अली की कहानी आंखें खोलने वाली है। इरशाद किस्मत वाले थे जो ज़िंदा बच गए। उनकी कहानी एक साथ व्यवस्था की कई खामियों को उजागर करती है। यह धर्म के नाम पर भेदभाव करती है, यह अपने नागरिकों को आतंकवादी से अपराधी तक बनने के लिए मजबूर करती है, यह व्यवस्था इतनी अक्षम है कि यह सब करने में असफल रहने पर अपने ही लोगों को जेल में डाल देती है, इतना सब होने के बाद भी अगर कोई अदालतों के जरिए बच जाता है तो यह व्यवस्था इस यातना के लिए ज़िम्मेदार लोगों से पलट कर दो सवाल भी नहीं कर पाती, किसी को जवाबदेह तक नहीं ना पाती।

इरशाद जिन्हें महीनों के टॉर्चर, 4 साल की जेल, 11 साल की कानूनी लड़ाई के लिए मजबूर किया गया, क्या जवाबदेह एजेंसियों और अफ़सरों से इसकी वजह पूछी जा सकती है? इरशाद जब जेल में रहे, तब घर चलाने के लिए उनकी बीवी शबाना ने अकेले लंबा संघर्ष किया। वक़्त से पहले उनकी उम्र ढल गई।

नांगलोई की एक झुग्गी बस्ती इंदिरा एन्क्लेव में जहां इरशाद का घर है, वह बियाबान इलाका है। घर तक पहुंचने के लिए कच्ची सड़क है। 30 ग़ज़ के मकान के ठीक बाहर जहां आसपास के घरों से निकलने वाला गंदा पानी जमा होता है, वहां इरशाद का सबसे छोटा बेटा और उनकी बहन की बेटी हाथ में हाथ डाले खड़े हैं। एक छोर पर कब्रिस्तान है और ज़मीन का बाक़ी टुकड़ा बंजर खेत।

1991-1996: मज़दूर

41 साल के इरशाद की पैदाइश दिल्ली की है। उनके अब्बा मुहम्मद यूनुस दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट में एक वकील के मुंशी थे। मदरसे की तालीम के लिए उन्होंने इरशाद को दरभंगा में अपने पुश्तैनी गांव पैग़ंबरपुर भेजा। इरशाद ने मदरसा अहमदिया सल्फिया से क़ुरआन का हाफ़िज़ा मुश्किल से किया। वहां का सख़्त अनुशासन वह नहीं झेल पाए और पढ़ाई बीच में छोड़कर 1991 में दिल्ली आ गए।

इरशाद के बड़े भाई नौशाद एक मर्डर में सज़ायाफ़्ता हैं। 25 साल से वह तिहाड़ में हैं। 1991 में दिल्ली लौटने तक इरशाद की छह बहनों में से दो की शादी हो गई थी और चार कुंवारी थीं। घर चलाने की ज़िम्मेदारी इरशाद और उनके अब्बा युनूस पर थी। 1996 में मुहम्मद यूनुस ने इरशाद को एक पुराना ऑटो ख़रीदकर दिया।

1996-2001: ऑटो ड्राइवर

ऑटो चलाने के दौरान इरशाद अपने भाई नौशाद से मिलने तिहाड़ जाया करते थे। मुलाक़ात के दौरान जेल के अन्य क़ैदी जो जेल में नौशाद के दोस्त बने थे, वो इरशाद के ज़रिए अपने घर चिट्ठियां भेजने जैसे काम करवाने लगे। इसकी ख़बर दिल्ली पुलिस को लग गई और यहीं से उनके बुरे दिन शुरू हुए।

1996 में दिल्ली पुलिस के एसीपी राजबीर सिंह ने इरशाद और उनके अब्बा को हिरासत में ले लिया। दोनों को मौरिस नगर थाने में एक-दूसरे के सामने टॉर्चर किया जाता। इरशाद से पूछा जाता कि उनके संबंध किन-किन आतंकियों से हैं?

इरशाद के लिए पुलिस यातना का यह पहला अनुभव था जिसमें उन्हें उलटा लटकाकर मारने से लेकर उनके यौन अंगों पर पेट्रोल तक डाला गया। इरशाद कहते हैं, ‘टॉर्चर के दौरान पुलिस हिंसा के साथ-साथ अपमानित करने के हर उपाय इस्तेमाल करती थी।’ 10 दिन की यातना के बाद दोनों को छोड़ दिया गया।

जिस एसीपी राजबीर सिंह ने उन्हें उठाया था, वह दिल्ली पुलिस के इतिहास के सर्वाधिक विवादित अफ़सरों में से रहे हैं। 1982 में उन्होंने बतौर सब इंस्पेक्टर दिल्ली पुलिस ज्वाइन किया और महज़ 13 साल में प्रोमोट होकर एसीपी बने थे। वह एनकाउंटर स्पेशलिस्ट थे मगर 2008 में उनके ही एक जानकार प्रॉपर्टी डीलर ने गुड़गांव में उनकी हत्या कर दी। इससे पहले वह 50 से ज़्यादा एनकाउंटर कर चुके थे। 3 नवंबर 2002 को अंसल प्लाज़ा में दो ‘आतंकियों’ का विवादित एनकाउंटर भी उन्होंने ही अंजाम दिया था।

इरशाद अली को दूसरी बार चार महीने बाद क्राइम ब्रांच के एसीपी रविशंकर ने उठाया। उन्हें 8 दिनों तक चाणक्यपुरी पुलिस स्टेशन में यातना दी गई और आतंकियों से रिश्ते पर क़ुबूलनामे का दबाव बनाया जाता रहा।

यहां से रिहा होने पर अगले पांच साल तक इरशाद का जीवन यूं ही गुज़र गया। शबाना नाम की एक लड़की से उनकी शादी हो गई थी और एक बेटा भी हो गया था।

शादी के बाद इरशाद और शबाना

2001-2005: सिक्रेट एजेंट

तीसरी बार इरशाद को नवंबर-दिसंबर के महीने में 2001 में आईबी ने उठाया। अनजान जगह पर साउंड प्रूफ़ कमरे में उन्हें रखा गया। तीन दिनों तक टॉर्चर किया गया और आतंकियों से रिश्ते पर क़ुबूलनामे का दबाव बनाया जाता रहा। इरशाद के मुताबिक, ‘उसी दौरान वहां आने वाले आईबी के एक बड़े अफ़सर ने अपने मातहतों से कहा कि इसे क्यों टॉर्चर करते हो। यह काम का आदमी है।’

इरशाद के सामने मुख़बिर बनने की शर्त रखी गई। उन्होंने हामी भर दी जिसके बाद आईबी के अधिकारियों ने उन्हें लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन पर अपनी गाड़ी से ले जाकर छोड़ा। साथ में घर तक जाने के लिए 500 रुपए भी दिए।

2001 से इरशाद आईबी के लिए मुख़बिरी करने लगे। उनका काम उन चिट्ठियों को पहले आईबी को दिखाना होता था जो तिहाड़ जेल के क़ैदी अपने घर पहुंचाने के लिए इरशाद को दिया करते। आईबी का मानना था कि इन चिट्ठियों से उन्हें होने वाले किसी अपराध की कोई लीड मिल सकती है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आईबी इस काम के लिए उन्हें हर महीने 5 हज़ार की तनख़्वाह देती थी।

इसी दौरान इरशाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के भी सिक्रेट एजेंट बन गए थे। उनकी मुख़बिरी से क्राइम के मामले सुलझते तो पर्दे के पीछे से यह सब देखकर इरशाद को फख्र होता कि वह इंटलिजेंस ब्यूरो और स्पेशल सेल जैसी संवेदनशील एजेंसी के सिक्रेट एजेंट हैं। वह पिछली पुलिस यातनाओं को भूल गए थे और अपने कज़िन मौरिफ़ क़मर को भी एजेंसियों से मिलवाकर इस काम में लगा दिया था।

इरशाद की मुख़बिरी से दिल्ली पुलिस ने अपराध के कई मामले सुलझाए लेकिन इंटलिजेंस ब्यूरो के लिए वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। तिहाड़ जेल से मिली चिट्ठियों से आईबी को कोई लीड नहीं मिल रही थी। वह हर दो चार दिन में आईबी के अफ़सरों से मिलते। उनके साथ उठते-बैठते, खाते-पीते लेकिन हाथ कुछ नहीं आ रहा था। इस दौरान आईबी के ही एक बुज़ुर्ग अफ़सर इरशाद की ब्रेनवॉशिंग करते। उन्हें कनविंस करते कि देश के लिए कुछ करो। इरशाद उस अफ़सर को श्याम अंकल बुलाते थे।

2003 में आईबी ने इरशाद की मुलाक़ात अपने दो कश्मीरी एजेंटों इम्तियाज़ और फ़ैय्याज़ से करवाई और पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों के बीच पैठ बनाने के लिए कहा। चूंकि इरशाद एक सलफ़ी विचारधारा के मदरसे से हाफ़िज़े क़ुरआन थे, तो आईबी के अफ़सर कहते कि तुम्हारा बैकग्राउंड बिल्कुल परफ़ेक्ट है। तुम आसानी से उन आतंकी संगठनों के बीच अपनी जगह बना सकते हो।

आईबी ने इरशाद को फ़ोन दे रखा था और पाकिस्तान के कुछ नंबर भी जिनपर बात करके वह आईबी को रिपोर्ट करते थे। आईबी के अफ़सर भी उन्हें अपने आधिकारिक नंबरों से बराबर फ़ोन लगाते रहते। इरशाद के मुताबिक दो साल के बीच कम से कम 90 कॉल और कुछ मैसेज उनके मोबाइल पर आईबी अफ़सरों के नंबर से आए थे जो उनकी बेगुनाही साबित करने में पुख़्ता सुबूत बने।

जब पाकिस्तानी नंबरों पर बातचीत से भी आईबी को कोई ख़ास लीड नहीं मिली तो उन्हें पाकिस्तान जाकर वहां आतंकियों के बीच  पैठ बनाने के लिए कनविंस किया गया। 2004 में वह पाकिस्तान में घुसपैठ के लिए निकले लेकिन जम्मू के सीमाई इलाक़े में मिलिट्री इंटेलिजेंस के हत्थे चढ़ गए। ख़ुद को आईबी एजेंट बताने के बावजूद यहां मिलिट्री इंटेलिजेंस ने उन्हें चार दिनों तक यातना दी, फिर दिल्ली के आईबी के अफ़सर जम्मू गए और इरशाद को छुड़ाकर लाए।

2005-2016: आतंकवादी

इरशाद की केस स्टडी से साफ़ है कि आईबी की तमाम कोशिशों के बावजूद उसे टेरर नेटवर्क की कोई पुख़्ता लीड नहीं मिल पा रही थी। तब आईबी ने उनसे कहा कि वह अपना पासपोर्ट बनवाएं और लीगल तरीक़े से पाकिस्तान में एंट्री करें। मगर पासपोर्ट बनने के दौरान ही इरशाद का मन बदल गया। वह सरबजीत और अन्य एजेंटों की ख़बरें पढ़कर डर गए थे। उन्होंने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया और देश में ही रहकर मुख़बिरी करने को कहने लगे। आईबी भी उनसे कह चुकी थी कि अगर वह पाकिस्तान में पकड़े गए तो कोई मदद नहीं कर पाएंगे।

इसी दौरान आईबी के एक अफ़सर माजिद दीन के एक प्रोपोज़ल ने इरशाद का मन खट्टा कर दिया और उन्होंने मुख़बिरी के काम से अलग होने का मन बना लिया। बार-बार किसी लीड में नाकाम होने पर माजिद दीन ने उनसे एक बार कहा था, ‘काम होता नहीं है, काम बनाया जाता है। क़ुर्बानी के लिए बकरे तैयार किए जाते हैं।’

इरशाद से कहा गया कि वह मुसलमानों की बस्तियों में जाएं। वहां लड़कों में उन्मादी जज़्बात पैदा करें। उन्हें पाकिस्तान ट्रेनिंग के लिए भेजे और फिर जैसे ही वे भारत लौटकर वापस आएंगे, हम उन्हें आतंकवादी कहकर गिरफ़्तार कर लेंगे। इस तरह आईबी का ‘गुडवर्क’ हो जाएगा।

इरशाद कहते हैं कि मुझे यही बात ग़लत लगी। यह एक तरह से मासूम लड़कों को फंसाने का प्रोजेक्ट था। मैंने इस काम के लिए मना कर दिया और आईबी के पास जाने से बचने लगा।

इरशाद दिसंबर 2005 में आईबी से मिलने वाली 5 हज़ार की तनख़्वाह लेने भी नहीं गए। फिर 12 दिसंबर को उनके पास माजिद दीन का फोन आया। माजिद ने कहा कि वह मिलते नहीं आया और इस महीने की तनख़्वाह लेने नहीं आए। इरशाद धौला कुआं के करीब मौर्या होटल के पास उनसे मिलने गए और यहीं से उन्हें जिप्सी में रखकर उठा लिया गया। इरशाद को नहीं पता चला कि उन्हें किस जगह रखा गया है। वह अमूमन इनसे मौर्या होटल, आईटीओ और बंगाली मार्केट के पास मिला करते थे।

इसके बाद इनके कज़िन मौरिफ़ क़मर को भी उठाया गया। जब मौरिफ़ को आईबी ले जा रही थी तो उनकी आंख पर पट्टी डालना भूल गई थी। जब आईबी को याद आया तो उन्होंने जल्दबाज़ी में मौरिफ़ की आंख पर पट्टी बांधी। इरशाद बताते हैं कि तब मौरिफ़ ने सड़क पर लगा साइनेज देख लिया था, वह राजघाट का इलाक़ा था। इसके दो तीन मिनट बाद गाड़ी रुक गई थी और मौरिफ़ भी सेल में डाल दिए गए थे।

इरशाद और मौरिफ़ को सेल में फरवरी के पहले हफ्ते तक रखा गया। इरशाद कहते हैं कि हमारा सेल लाल क़िले के आसपास कहीं था। हर साल गणतंत्र दिवस के मौक़े पर लाल क़िले के परिसर में मुशायरा हुआ करता है। जनवरी 2006 में जब यह मुशायरा हो रहा था तो शायरों की नज़्में और ग़ज़ले इरशाद के सेल तक आ रही थीं। इरशाद ने कहा, ‘मैं पूरी रात लेटा हुआ मुशायरा सुन रहा था।’

लाल क़िले पर मुशायरे की परंपरा मुग़लों के दौर से चल रही है। यहां दीवान-ए-आम में सालाना मुशायरा हुआ करता था। दिल्ली के बाशिंदे इसे सुनने जाया करते थे। 1857 में जब अंग्रेज़ों ने लाल क़िले पर कब्ज़ा किया तो यह रिवायत बंद हो गई थी। आज़ादी के बाद 1950 में गणतंत्र दिवस के मौक़े पर प्रधानमंत्री नेहरू ने इसे दोबारा शुरू किया लेकिन 2016 में पहली बार सुरक्षा कारणों का हवाला देकर यह मुशायरा रद्द कर दिया गया।

इरशाद बताते हैं, ‘सेल में मुझे बताया गया कि मेरा एनकाउंटर करने की तैयारी थी क्योंकि मैंने आईबी का काम करने से मना कर दिया था। उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुझे खिला-पिलाकर इसीलिए बड़ा किया था? हम तुझे मारने वाले थे लेकिन इरादा बदल दिया। अब कुछ साल जेल में रहना और जब काम करने के लिए तैयार हो जाना तो हमें जेल से चिट्ठी लिख देना, हम दो चार साल में तुम्हें निकलवा लेंगे।’

तक़रीबन 2 महीने तक इसी तरह सेल में रहने के बाद 9 फ़रवरी 2006 को इरशाद और मौरिफ़ को करनाल बाइपास ले जाया गया। यहां उनकी तस्वीरें ली गईं और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मीडिया के सामने पेश कर कहा कि अल बद्र के दो आतंकी गिरफ़्तार किए गए हैं। उस वक़्त की अगर मीडिया में छपी ख़बरें पढ़ें तो ज़्यादातर अख़बारों ने हूबहू स्पेशल सेल की मनगढ़ंत कहानी छाप दी है। क्राइम रिपोर्टरों ने अपने स्तर पर पुलिस के दावों की पड़ताल करने की ज़हमत नहीं उठाई।

इरशाद जब तिहाड़ जेल में थे, तब वहां उनकी अपने भाई नौशाद समेत तमाम क़ैदियों से मुलाक़ात होती थी। संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु भी दिख जाते थे। एक बार जब इरशाद ने अफ़ज़ल गुरू से अपने टॉर्चर के बारे में बताया तो वह हंसने लगे। बक़ौल इरशाद, ‘अफ़ज़ल गुरु ने कहा था कि यह टॉर्चर कुछ भी नहीं है। मुझे बाथरूम में बंद करके मेरे सिर पर पेशाब किया गया है।’

इरशाद और मौरिफ़ की गिरफ़्तारी पर हुई रिपोर्टिंग की कतरनें

 

2009-2016: बेगुनाह

मौरिफ़ क़मर के भाई ने इस केस में दिल्ली हाईकोर्ट को अप्रोच किया था। जब स्पेशल सेल की कहानी पर शक हुआ तो हाईकोर्ट ने सीबीआई से तफ़्तीश का आदेश दिया। 11 नवंबर 2008 को सीबीआई ने अपनी क्लोज़र रिपोर्ट में इरशाद अली की मुख़बिरी से लेकर आतंकवादी होने तक का सिलसिलेवार ब्यौरा सुबूतों के साथ कोर्ट को सौंप दिया था। सीबीआई की जो टीम इस केस की तफ़्तीश कर रही थी, उसे स्पेशल सेल के एक पुलिसकर्मी ने फोन पर धमकाया था। तब सीबीआई ने अपनी जानमाल की गुहार दिल्ली हाईकोर्ट से लगाई थी।

सीबीआई की तफ़्तीश के दौरान की कतरनें

सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट के आधार पर इरशाद को 2009 में ज़मानत मिली और 22 दिसंबर 2016 को उन्हें कोर्ट ने बेगुनाह क़रार दे दिया है। इरशाद जब तिहाड़ में थे तो उनकी बीवी शबाना मज़दूरों के लिए खाना बनाकर घर का ख़र्च चलाती थीं। इस केस से बाहर निकलने पर शबाना धीमे से मुस्कुराती हैं लेकिन अपने मुश्किल दिनों के बारे में कुछ बोल नहीं पातीं। वो इरशाद की तरफ़ इशारा करते हुए कहती हैं, ‘बस उन्होंने जितना बोल दिया, उतना ठीक है।’

28 दिसंबर को इरशाद अली के रिहा होने की स्टोरी इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में छपी थी। इसमें इरशाद के हवाले से लिखा है, ‘जिन्होंने ज़ुल्म किया, मुझे उनपर कार्रवाई की उम्मीद नहीं है। उनपर कार्रवाई का कहीं ज़िक्र तक नहीं हुआ है। हम जानते हैं कि सरकार हमसे एक बार माफ़ी तक नहीं मांगेगी।’

यह ख़बर पढ़कर एक रिटायर्ड जज इरशाद अली के घर गए। वह इरशाद से माफ़ी मांगना चाहते थे लेकिन उस दिन इरशाद टैक्सी लेकर जयपुर गए थे। इस रिपोर्टर से इरशाद की बीवी शबाना ने बताया कि जज साहेब ने माफ़ी मांगी। अपना फोन नंबर और पता भी लिखकर दिया है।

2005 में जेल जाने से पहले तक इरशाद ऑटो चलाते थे। ऑटो की आमदनी के अलावा उन्हें 5 हज़ार रुपए प्रति माह आईबी से मिलते थे। अब वह एक कैब कंपनी में टैक्सी ड्राइवर हैं। उनकी तनख़्वाह 7 हज़ार रुपए है। बड़ा बेटा नौवीं की पढ़ाई पूरी कर चुका है। आगे पढ़ाने के लिए रुपए नहीं हैं। जल्द ही इरशाद अपने बेटे को ऑटो चलाने के काम में लगाएंगे।

साभार: कैच हिंदी 

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