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मुसलमान सिर्फ़ ओहदों का नहीं, इख़्तयारात का मुतालिबा करें

न्यूज़ एडीटर रोज़नामा सियासत जनाब आमिर अली ख़ान ने मुसलमानों को पहले अपनी सफ़ों में इत्तिहाद पैदा करने और हमदर्द के साथ हमदर्द बन कर पीठ में ख़ंजर घोंपने वालों को पहचाने का मश्वरा दिया और कहा कि तालीम ही हमारी ज़िंदगी में इन्क़िलाबी तरक

न्यूज़ एडीटर रोज़नामा सियासत जनाब आमिर अली ख़ान ने मुसलमानों को पहले अपनी सफ़ों में इत्तिहाद पैदा करने और हमदर्द के साथ हमदर्द बन कर पीठ में ख़ंजर घोंपने वालों को पहचाने का मश्वरा दिया और कहा कि तालीम ही हमारी ज़िंदगी में इन्क़िलाबी तरक़्क़ी को बरपा कर सकती है और हमारी मईशत को मुस्तहकम करने में मुआविन साबित हो सकती है।

कुरनूल के मुसलमान हर एतबार से बह शऊर हैं। सिर्फ़ इत्तिहाद वक़्त का तक़ाज़ा है। अगर मुसलमानों के साथ अक़लीयतें और पसमांदा तबक़ात में इत्तिफ़ाक़ पैदा हो जाता है तो हर सियासी ताक़त हमारे सामने घुटने टेकने और हमारे एजेंडे को अपने अपने इंतिख़ाबी मंशूर में शामिल करने के लिए मजबूर हो जाएगी। सियासी जमातें ऐन इंतिख़ाबात से क़ब्ल मुसलमानों और अक़लीयतों को सब्ज़ ख़ाब दिखाते हुए उन्हें गुमराह कर रही हैं। बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद मुसलमान मुत्तहिद हुए हैं।

हर सियासी जमात ने अब तक अक़लीयतों के जज़बात का इस्तिहसाल किया है और हमें सिर्फ़ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है। हुकूमत ने अक़लीयती बजट को 1027 करोड़ रुपये तो कर दिया है, मगर अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है ताहाल सिर्फ़ 400 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए हैं माबाकी 600 करोड़ रुपये सरकारी खज़ाने में वापिस होने के ख़द्शात हैं।

सियासी जमातें मुसलमानों के वोटों को इस्तेमाल करना चाहते हैं मगर उन की तरक़्क़ी और बहबूद के लिए कोई संजीदा नहीं है। सब से बड़ी बदबख़्ती की बात ये हैका मुसलमानों को अपनी ताक़त का अंदाज़ा नहीं है। इस लिए वो मुसलमानों से अपील करते हैं कि पहले वो सफ़ों में इत्तिहाद पैदा करें और अपनी तहरीक में पसमांदा तबक़ात को भी शामिल करें। जनाब आमिर अली ख़ान ने कहा कि हक़ मांगने से नहीं मिलता बल्कि जम्हूरीयत में उस को छीन लेना पड़ता है।

छीनने के लिए मुसलमानों में इत्तिहाद चाहीए। मर्कज़ी हुकूमत ने अक़लीयतों की तरक़्क़ी के लिए 2000 करोड़ रुपये का बजट मुख़तस किया है, जिस में सिर्फ़ 800 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए हैं जबकि एस सी, एस टी तबक़ात की तरक़्क़ी के लिए 20 हज़ार करोड़ रुपये मुख़तस किया गया है मगर ख़र्च 28 हज़ार करोड़ रुपये किए गए रियास्ती हुकूमत ने 4 फ़ीसद मुस्लिम तहफ़्फुज़ात फ़राहम किया है मगर हम इस से मुकम्मल इस्तिफ़ादा करने में नाकाम हैं।

आज मुसलमानों की हालते ज़ार ये है कि गैर मुस्लिम अवामी नुमाइंदे मुजाहिदे आज़ादी और मुल्क के पहले वज़ीरे तालीम मौलाना अबूल कलाम आज़ाद की बरसी के मौक़ा पर अपने ख़िताब से ऐन क़ब्ल मुस्लिम लीडरान से पूछते हैं कि मुजाहिदे आज़ादी का नाम अबूल कलाम है यह अब्दुल कलाम? जिन लीडर्स को मुस्लिम मुजाहिदे आज़ादी और आज़ाद भारत के अव्वलीन वज़ीरे तालीम का सही नाम मालूम ना हो वो मुसलमानों की क्या ख़ाक फ़लाहो बहबूदी अंजाम देंगे।

इन ख़्यालात का इज़हार मौलाना मुफ़्ती शेख मुहम्मद इलियास क़ासिमी नैलोर और नायब इमाम और ख़तीब जामिआ मस्जिद अमीर सुल्तान अल ख़बर सऊदी अरब ने शहर कुरनूल के मुनिसिपल हाई स्कूल ग्राऊंड में मुनाक़िदा एक अज़ीमुश्शान इजलासे आम बा उनवान “मुसलमानों की सियासी गरज” से ख़िताब करते हुए किया। निज़ामत के फ़राइज़ हाफ़िज़ अब्दुल ग़नी उमरी ने अंजाम दिए और सदारती कलेमात सय्यद ज़ाकिर अहमद रशादी ने पेश किए।

जल्से का इख़तेताम मौलाना अब्दुल हकीम उमरी अमीर शहरी जमीअत अहलेहदीस की दुआ पर हुआ। वाज़ेह हो कि कुरनूल की तारीख में मुसलमानों के किसी प्रोग्राम के कवरेज के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नुमाइंदे शरीक रहे। और दस हज़ार से ज़ाइद अवाम इस जल्से में शरीक थे।

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