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मुस्लमान जोश को छोड‌ कर के मआशी-ओ-समाजी तरक़्क़ी पर तवज्जो दें : मौलाना मुजद्ददी

लखनऊ 21 मार्च : मुस्लमानों को जज़बाती मुआमलात से दूर रहते हुए अपनी तमाम तर तवज्जो समाजी-ओ-मआशी तरक़्क़ी की जानिब करनी चाहिए । जज़बाती मुआमलात में उलझ कर झगडे के वाक़ियात की वजह बन जाना अकलमंदी नहीं । ज़रूरत इस बात की है कि मुस्लमान पालिसी साज़ों के साथ बातचीत और बात चीत‌ की राह अपनाऐं क्यों कि आज के इस दौर में सिर्फ़ बात चीत‌ ही एहमियत के हामिल हैं ।

अगर मुस्लमान पसमांदा(पिछडा) हैं या उन्हें पसमांदगी की नज़र कर दिया गया हो तो इस सूरत-ए-हाल में कोई भी मुल्क ( ख़ुसूसी तौर पर हिंदूस्तान) तरक़्क़ी नहीं करसकता । मौलाना मुहम्मद फ़ज़ल उल रहमन मुजद्ददी जो स्टराइपो फ़ार एमीननस ऐंड अमपावरमेंट (SEE) के सदर नशीन हैं।

ने आन पिया किंग आफ़ 12 वीं प्लान ( माइनारीटीज़ चियापटर) की क़ौमी कान्फ़्रैंस से अपने कलीदी ख़िताब के दौरान कहा कि मुस्लमानों को अपनी बिरादरी की बेइजती केलिए ज़्यादा से ज़्यादा NGOs क़ायम करने की ज़रूरत है क्यों कि मुस्लमानों की फ़लाह-ओ-बहबूद और उन्हें बाइख़तियार बनाने केलिए मुस्लमानों के ज़रिया ही क़ायम करदा एन जी औज़ की तादाद आटे में नमक के बराबर है ।

जो भी मुस्लिम एन जी औज़ हैं वो ग़ैर मुनज़्ज़म हैं । उनके पास इनफ़रास्ट्रक्चर और मुनासिब रहनुमाई का फ़ुक़दान है जबकि अवामी स्किमात के बारे में भी एन एन जी औज़ की मालूमात नाक़िस हैं । एन जी औज़ को मुख़्तलिफ़ फ़लाही स्किमात केलिए दरकार फंड्स के हुसूल केलिए दरख़ास्त देने का तरीक़ा भी मालूम नहीं है।

गुजिश्ता इतवार को गिना संस्था में मज़कूरा कान्फ़्रैंस का इनइक़ाद किया गया था । SEE नई दिल्ली एक तंज़ीम है जो तालीम के शोबा में मुस्लमानों की रहनुमाई और उनकी तरक़्क़ी के लिए कोशां है । उन्होंने वज़ारत फ़रोग़ इंसानी वसाइल की दिसम्बर 2012-ए-में तैयार करदा एक रिपोर्ट का भी तज़किरा किया जहां 1947-ए-में सिर्फ़ 8.5 फ़ीसद मुस्लिम ख़वातीन ने कॉलेज की तालीम हासिल की जबकि यही तनासुब आज कम होकर सिर्फ़ 2.4 फ़ीसद रह गया है ।

लिहाज़ा ये कहा जा सकता है कि तक़सीम के वक़्त मुस्लमान ख़वातीन की तालीम का तनासुब हिंदू ख़वातीन से बेहतर था लेकिन अब मुस्लिम ख़वातीन की हालत बदतरीन है ।

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