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मुस्लमान हज के पैग़ाम को आम करें: मौलाना क़ासिमी

हज तज़किया-ए-नफ़स और अल्लाह से तक़र्रुब के हुसूल का बेहतरीन ज़रिया है। जिन लोगों को हज की सआदत नसीब होरही है , वो बड़े ख़ुश नसीब हैं।

हज तज़किया-ए-नफ़स और अल्लाह से तक़र्रुब के हुसूल का बेहतरीन ज़रिया है। जिन लोगों को हज की सआदत नसीब होरही है , वो बड़े ख़ुश नसीब हैं।

इन ख़्यालात का इज़हार मुमताज़ आलमे दीन और किशनगंज के रुक्न पार्लियामेंट मौलाना इसरार उल-हक़ क़ासिमी ने पटना के हज हाउस में हाजियों की रवानगी के मौके पर ख़िताब करते हुए किया। उन्होंने कहा कि हज की फ़ज़ीलत-ओ-अहमियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अल्लाह ताला हज अदा करने वालों के गुनाह माफ़ फ़र्मा देता है।

हज इस लिहाज़ से बड़ी नुमायां इबादत है, इस अहम इबादत के बेशुमार फ़ज़ाइल अहादीस नबवी में मज़कूर हैं, ये फ़रीशा बैक वक़्त रुहानी, माली और जिस्मानी तीनों पहलूओं पर मुश्तमिल है। मौलाना मौसूफ़ ने मज़ीद कहा कि जो लोग हज बैतुल्लाह केलिए तशरीफ़ ले जा रहे हैं, वो इस मौके को निहायत अहम समझते हुए अल्लाह की ख़ुशनुदी के हुसूल में पूरी तरह मुनहमिक होजाए और अरकान हज की अदाएगी पर अपनी तमाम तर तवज्जो को मबज़ूल रखें।

अगर मुसल्मान हज के पैग़ाम को आम करें और हुज्जाज किराम हज से वापसी के बाद अल्लाह से अपने रिश्ते को क़ायम रखें, अपनी ज़िंदगी को दीन के मुताबिक़ गुज़ारें और बाहम इत्तिहाद-ओ-भाई चारगी का मुज़ाहरा करें तो वो ना सिर्फ़ दुनिया-ओ-आख़िरत की ज़िंदगी में कामयाब होंगे बल्कि उनके ज़रिया क़ौम-ओ-मिल्लत की इस्लाह भी होगी और उनकी मौजूदगी मुआशरे केलिए अहमियत की हामिल साबित होगी।

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