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मुहब्बत स०‍अ०व०: मुसलमानों की मुशतर्का क़दर क़ुव्वत

हुज़ूर रहमतुल आलमीन‌ , ख़ातेमन नबीईन मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की शान अज़मत और दीन हक़ इस्लाम की हक़्क़ानियत के ख़िलाफ़ गुस्ताख़ी पर मबनी ( बनी) फ़िल्म की तैय्यारी और इस की तशहीर नुमाइश की मुजरिमाना हरकत ने सारी दुनिया की आबादी के ए

हुज़ूर रहमतुल आलमीन‌ , ख़ातेमन नबीईन मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की शान अज़मत और दीन हक़ इस्लाम की हक़्क़ानियत के ख़िलाफ़ गुस्ताख़ी पर मबनी ( बनी) फ़िल्म की तैय्यारी और इस की तशहीर नुमाइश की मुजरिमाना हरकत ने सारी दुनिया की आबादी के एक तिहाई बावक़ार तबक़ा यानी मुसलमानों और संजीदा फ़िक्र लोगों के क़ुलूब( दिल) को मजरूह, रूहों को मुज़्तरिब और वजूद को आज़ुर्दा (गमगीन) कर दिया है।

मुआनिदीन (फीसदी )हक़ की हक़ पसंदों के ख़िलाफ़ मुजरिमाना साज़िशों और फ़ित्ना अंगेज़ियों का सिलसिला यूं तो सदीयों से किसी ना किसी सूरत में जारी है।

ये वाक़िया है के इस अहानत आमेज़ (अपमान करने वाली ) फ़िल्म का बनाना और दिखाया जाना इसी तसलसुल का काबिल नफ़रत हिस्सा है। इस काबिल सद हज़ार मज़म्मत वाक़िया के ख़िलाफ़ दुनिया भर के मुसलमानों का हर सतह पर एहतिजाज और ग़म ग़ुस्सा के इज़हार की लहर फ़ित्री भी है और अपनी शदीद ब्रहमी (ग़ुस्सा) के ज़ाहिर करने की वाजिबी हक़ीक़त की हामिल भी है जिस ने मुआनिदीन हक़, मुख़ालिफ़ीन इस्लाम और हुज़ूर ख़ातेमन नबीईन रसूल ( स०अ०व०) इंसानियत मुहम्मद स०अ०व० की शान ए अक़्दस आला मे गुस्ताख़ी करने वालों को झंझोड़ने और वाक़ई एहसास दिलाने की कामयाब मूसिर कोशिश की है कि मुसलमान अपने रसूले पाक को अपनी जानों से ज़्यादा अज़ीज़ महबूब रखता है और अपने दीन हक़ से सच्ची वाबस्तगी रखता है।

मुसलमाना आलिम अनपी अपनी ज़ात की हद तक हर चीज़ गवारा और बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन अपने रसूल पाक की अज़मत रिफ़अत, ताज़ीम तकरीम और हुज़ूर(pbuh) की ज़ात अतहर अक़्दस में किसी तरह की बेअदबी, इहानत और गुस्ताख़ी बर्दाश्त नहीं कर सकते और इज़्ज़त नामूस हबीब किब्रिया स०अ०व० के तहफ़्फ़ुज़ के लिए अपनी जान से गुज़र जाते हैं।

साल रवां एक सवाए ज़माना फ़िल्मसाज़ ने इहानत इस्लाम पर मुश्तमिल एक फ़िल्म इंटरनेट पर रीलीज़ की है जिस ने सारी दुनिया के मुसलमानों की रूहों को झुलसा दिया और दिलों पर कारी ज़ख्म लगा दिए हैं। इस फ़िल्म ने इस्लाम दुश्मन ज़हनीयत और मुसलमानों की दिल आज़ारी की मंसूबा बंदी को खुले तौर पर वाज़िह कर दिया है।

इंटरनेट पर मुश्तहिर इस फ़िल्म ने मुआनिदीन इस्लाम को पूरी तरह ज़ाहिर कर दिया है। सारी दुनिया के मुसलमानों ने इन मकरूह-ओ-क़ाबिल नफ़रीं ज़हनीयत रखने वालों को अच्छी तरह जान लिया है।

इस पर इस्लामी मुल्कों ने संजीदगी के साथ शदीद रद्द-ए-अमल का इज़हार किया और सिफ़ारती एहतिजाज और इन्क़िता तालुक़ात के अमली इक़दामात किए हैं, सारी दुनिया के मुसलमानों ने अपने कलबी इज़तिराब और ग़म ग़ुस्सा के इज़हार के लिए निहायत मुनज़्ज़म और मुंज़ब्त मुज़ाहिरे किए हैं। जिन का सिलसिला ताहाल ( अभी तक) जारी है और इस वक़्त तक जारी रहेगा।

जब तक कि इंटरनेट पर इस फ़िल्म के मुकम्मल इमतिना ( रोक) के लिए तमाम ममालिक अमली अहकाम जारी नहीं करते और इस फ़िल्म पर कामिल पाबंदी लगाते हुए नुमाइश के लिए ममनू (मान) क़रार नहीं दिया जाता वनीज़ ख़ातियों को इबरतनाक सज़ा नहीं देते, ताके आइन्दा किसी फ़र्द, इदारा, कंपनी और टी वी चैनल को इस फ़िल्म और ऐसी दिलाज़ार ( दिल को ठेस पहुँचाने वाली) फिल्में पेश करने की जुर्रत ना हो सके इस सिलसिले में आलमी सतह पर क़ानूनसाज़ी और इस के नफ़ाज़ की सख़्त ज़रूरत है और वाक़ातन मुसलमान इस तरह के इक़दामात की पुरज़ोर मांग करने में बिलकुल हक़ बजानिब हैं।

मज़हबी, अख़लाक़ी और मआशरती मुसलिमात की इहानत और बेहुर्मती पर रद्द ए अमल एक फ़ित्री अमर है। मुहज़्ज़ब और शाइस्ता मआशरा में किसी की इन्फ़िरादी (खुद‌) या इजतिमाई (सब) दिला ज़ारी को नाक़ाबिल माफ़ी जुर्म क़रार दिया जाता है। इस तरह की किसी भी हरकत को कोई भी नाम दिया जाय इज़हार ख़्याल , बोलने लिखने की आज़ादी वग़ैरा लेकिन इस तरह के मुआमलात में इस के पीछे कारफ़रमा ज़हनीयत को मआशरती जराइम में सब से ज़्यादा क़ाबिल मुवाख़िज़ा समझा जाएगा।

शान ए रिसालत(pbuh) और इस्लाम के मुतालिक़ गुस्ताखाना फ़िल्म की तैयारी और नुमाइश के ख़िलाफ़ रद्द ए अमल के बतौर तमाम दुनिया में ज़बरदस्त एहतिजाजी मुज़ाहिरे हर लेहाज़ से वाजिबी, फ़ित्री और हक़ बजानिब हैं, इन एहतिजाजी मुज़ाहिरों में तशद्दुद से अहितराज़ और बावक़ार तरीक़ा से नाराज़गी का इज़हार बिलख़सूस आला फ़िक्र नज़र का आईना दार और ख़ुश आइंद है

मुसलमानों को पूरी संजीदगी के साथ उन पर ग़ौर तदब्बुर करना और इस के तदारुक के लिए मुनासिब कोशिशें करनी होंगी। इन कोशिशों की कामयाबी के लिए मुहब्बत रसूल (pbuh) की मुशतर्का क़दर वक्वत है।

ये वो डोर है जो तमाम मुसलमानों को ख़ाह वो आ फ्रीका के दो (दूर) दराज़ इलाक़ों में हों या एशियाई मुल्कों के बासी हों ख़ाह मशरिक़ बईद में रहते हूँ या यूरोप अमेरीका के शहरों में बस्ते हों सब को यकजहत, मतहदो मुत्तफ़िक़, यकसू और क़वी रखने का सबब है और यही इश्क़ ए नबी(pbuh) और अज़मत रसूल (pbuh) के जज़बा का फ़ैज़ान है। इसे बहरहाल सलामत रखना सारे अहल सआदत का फर्ज़‌ है।

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