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मैं हिंदू हो सकती थी, लेकिन मैंने इस्लाम चुना

इस्लाम की अनुयायी वरीशा सलीम पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं. घर में तीन बिल्लियां सुग्गू, एश्ली और खल्लू पाल रखी हैं. फिटनेस के लिए जिम जाना नहीं भूलतीं और छूटती बस को दौड़कर पकड़ने में उन्हें मज़ा आता है. सोशल मीडिया पर ख़ासी एक्टिव हैं. खुद के वीडियो बनाकर अपने यूट्यूब चैनल एसएचए ट्यूब पर अपलोड करना उन्हें रोमांच से भर देता है. वो चाहती हैं कि इस्लाम से जुड़ी छोटी-मोटी गलतफहमियों को अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से दूर करें.
हिजाब या बुर्क़ा इस्लामिक परंपरा के सबसे विवादित मुद्दों में से एक है. दुनिया कभी भी इसपर एकराय नहीं बना सकी. किसी के लिए कैदख़ाना है तो कोई इसे इबादत का आध्यात्मिक तरीक़ा मानता है. वहीं वरीशा सलीम हिजाब पहनने के बाद ख़ुद को आज़ाद महसूस करती हैं. इसके लिए उनके अपने तर्क हैं जो खासे दिलचस्प हैं.

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मॉडर्न लोगों की नज़र में मैं एक परंपरावादी लड़की हूं और मज़हबी जमात मुझे मॉडर्न मानती है. सिर्फ पहनावे की वजह से मेरी शख़्सियत फुटबॉल बन गई लेकिन मैं इन दोनों में से कुछ भी नहीं हूं.

मैं कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ी एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं. मैं बिंदास हूं, प्रियंका चोपड़ा की तरह. मुझे हिजाब में देखकर मुंह ना बनाएं. मैं आपको हाईवोल्टेज का झटका दे दूंगी.

मैं हर दिन दो ग़रीबों को खाना खिलाती हूं, फिर अचानक से सिर्फ एक को खिलाना शुरू कर दूं तो क्या होगा? अच्छी मैं तब भी रहूंगी मगर ज़रा-सी कम. इसी तरह हिजाब पहनना मेरे उन छोटे-छोटे कामों में से एक है जो मुझे मेरे ख़ुदा के क़रीब ले जाता है. ये मेरा फर्ज़ है, साथ ही हक़ भी. इसके अलावा मेरी ज़िंदगी में हिजाब का कोई मतलब नहीं है.

साभार: hindi.catchnews.com/

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