Friday , September 22 2017
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मोदी के दौर में कैसे बदल गया देश ……

मै ये किसके नाम लिखू जो अलम गुज़र रहे हैं, मेरे देश जल रहे हैं मेरे लोग मर रहे हैं..!क्या मोदी सरकार से पहले भारत में मुस्लिम मांस नहीं खाते थे??? नई सरकार आने के बाद इस तरह के मामलो में किस हद तक बढ़ोतरी हुई है क्या कभी सोचा गया.

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बीते कुछ वक़्त से हर तरफ से इसी तरह की खबरे जोर पर हैं लेकिन अभी हाल ही की घटना जिसमे मध्य प्रदेश में मांस लेकर जा रही महिलाओं पर भीड़ ने जो हमला किया. क्या गौ रक्षक दल के लोगो की आँखे नहीं माइक्रोस्कोप हैं जो एक लैब में हो रहे टेस्ट से पहले जान लेते हैं के मांस गाय का ही है. क्या गौ रक्षक दल के लोगो से बचाने के लिए मानव रक्षक दल होना चाहिए या नहीं??? जवाब किसी के पास नहीं आज नहीं कल ज़ाहिर सी बार है हम में से ना जाने कितने लोगो के साथ ये होने वाला है.

अगर आज आवाज़ नहीं उठाएंगे तो कभी नहीं उठा पाएंगे. भारत में मुस्लिम सिर्फ पिछले 2 सालो से नहीं रह रहे हैं ये बात याद रखे, तो क्यों पिछले 2 सालो में इस तरह के मामलो में इतनी तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है.? सवाल तो बहुत है जवाब किसी के पास नहीं.
“जिंदा रहना है तो हालात से डरना कैसा, जंग लाजिम हो तो लश्कर नहीं देखे जाते”
पिछले कुछ वक़्त से मुस्लिम और दलितों की स्थिती बद से बद्तर होती जा रही है. कोई हाल पूछने वाला नहीं सब अपनी अपनी सियासी रोटिया सेकने में लगे हैं, और कुछ कुकुरमुत्ते जेसे दल बंदरो की तरह इस डाल से उस डाल पर उछल कूद में लगे हैं वो किसका कितना नुक्सान कर रहे हैं इसकी परवाह किसी को नहीं. सवाल सरकार से पहले इंसान पर है क्या हम पहले साथ नहीं रहते थे, साथ साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलते थे तो फिर इतनी नफरत किस लिए.
डर लगता है कुछ दिन में घर के आस पास उगी घांस भी कही मांस में तब्दील ना हो जाए और गौ रक्षा के नाम पर लोग आधमके लाठी डंडे लेकर. इसलिए कहती हु तैयार रहिये कही भी कुछ भी हो सकता है क्यूंकि मेरा देश बदल रहा है और इतना बदल रहा है जो आप सोच नहीं सकते वो हो रहा है.
कश्मीर में जो कुछ हो रहा है क्या वो चर्चा का विषय नहीं.?? गौ रक्षा के नाम पर देश में जगह जगह लोगो को मारा जाता है क्या वो चर्चा का विषय नहीं.?? लेकिन सरकार के पास इन सब सवालों पर चर्चा करने का ही वक़्त नहीं शायद.
आँख खोलकर देखिये अपने आस पास क्या कुछ हो रहा है. कब तक मूक दर्शक बन कर तमाशा देखेंगे. कभी तो अपने लिए खड़े होंगे या नहीं हमेशा दुसरो के पीछे छुपने से काम नहीं चलेगा. वक़्त अब बैठ कर देखने का नहीं है के अच्छे दिन आयेंगे, ये आपको खुद लाने पड़ेंगे बाकी आप समझदार है इतना समझ गए होंगे के केसे अच्छे दिन आये हैं.
लेखक -राहिला अंजुम
लेखक के निजी विचार है लेख के लियें सिआसत हिंदी किसी तरह उत्तरदायी नही है
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